18 सितंबर 2026

करमगति टारै नाहिं टरी

"करमगति टारै नाहिं टरी" भारतीय लोकजीवन में प्रचलित एक अत्यंत गूढ़ और सारगर्भित उक्ति है जो संत कबीरदास जी के भजन-पद से लिया गया है। इसका सीधा अर्थ है—कर्मों का फल टाला नहीं जा सकता। मनुष्य चाहे कितना भी शक्तिशाली, बुद्धिमान, धनी या प्रभावशाली क्यों न हो, उसे अपने किए हुए कर्मों का फल किसी न किसी रूप में अवश्य भोगना पड़ता है। यही सनातन धर्म का कर्म-सिद्धांत है, जिसे वेद, उपनिषद, श्रीमद्भगवद्गीता, रामायण और महाभारत जैसे महान ग्रंथों में विस्तार से समझाया गया है।

आज का मनुष्य अपने भाग्य को बदलने के लिए अनेक उपाय करता है। कोई ज्योतिषी के पास जाता है, कोई पूजा-पाठ करता है, कोई यज्ञ कराता है, तो कोई तंत्र-मंत्र का सहारा लेता है। ये सभी साधन आत्मबल, श्रद्धा और मानसिक शांति दे सकते हैं, परंतु यदि कर्म गलत हैं तो उनके फल भोगने से कोई नहीं बच सकता। इसी संदर्भ में इस तरह की कहावतें विशेष रूप से प्रचलित हैं—"जैसी करनी, वैसी भरनी।" और "कोई लाख करे चतुराई, करम का लेख मिटे ना भाई"

कबीर दास जी का भजन-पद:

करम गति टारै नाहिं टरी ॥

मुनि वसिष्ठ से पण्डित ज्ञानी, सिधि के लगन धरि ।

सीता हरन मरन दसरथ को, बनमें बिपति परी ॥ १॥

कहॅं वह फन्द कहाँ वह पारधि, कहॅं वह मिरग चरी ।

कोटि गाय नित पुन्य करत नृग, गिरगिट-योनि परी ॥ २॥

पाण्डव जिनके आप सारथी, तिन पर बिपति परी ।

कहत कबीर सुनो भइ साधो, होनी होके रही।। ३

भावार्थ:

कबीरदास जी कहते हैं कि कर्म की गति को टाला नहीं जा सकता। बड़े-बड़े ज्ञानी, ऋषि-मुनि और पुण्यात्मा भी अपने कर्मों के परिणाम से नहीं बच सके। वशिष्ठ जैसे ज्ञानी के समय भी राजा दशरथ को पुत्र-वियोग और सीता-हरण जैसी विपत्तियाँ आईं। राजा नृग ने करोड़ों गायों का दान किया, फिर भी कर्मफल के कारण उन्हें गिरगिट की योनि में जाना पड़ा। यहाँ तक कि जिन पांडवों के सारथी स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण थे, उन्हें भी अनेक कष्ट सहने पड़े।

कबीरदास जी का संदेश स्पष्ट है कि "जीवन में जो होना है, वह होकर रहता है।" इसलिए मनुष्य को अच्छे कर्म करते हुए सुख-दुःख में धैर्य और समभाव बनाए रखना चाहिए।

कर्म का शाश्वत नियम

इस सृष्टि का संचालन कुछ अटल नियमों पर आधारित है। जैसे अग्नि का स्वभाव जलाना और जल का स्वभाव शीतलता प्रदान करना है, वैसे ही कर्म का स्वभाव फल देना है। हमारे प्रत्येक विचार, प्रत्येक शब्द और प्रत्येक कर्म एक बीज के समान है जो उचित समय आने पर अवश्य फलित होता है।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मनुष्य को कर्म करने का अधिकार है, किंतु फल उसके अधिकार में नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं कि कर्म का फल नहीं मिलेगा, बल्कि अर्थ यह कि फल प्रकृति के न्याय के अनुसार निश्चित होगा। जैसे कहावत है, "बोये पेड़ बबूल का, तो आम कहाँ से होय" अर्थात् बबूल के पेड़ में आम का फल नहीं लग सकता है। 

यदि किसान गेहूँ बोता है तो धान की अपेक्षा नहीं कर सकता। उसी प्रकार यदि मनुष्य छल, कपट, हिंसा, झूठ और अन्याय का बीज बोएगा तो उसे सुख और शांति कैसे प्राप्त होगी?

कर्म और भाग्य का संबंध:

अनेक लोग कहते हैं कि सब कुछ भाग्य में लिखा है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि भाग्य बनता कैसे है? वास्तव में आज का भाग्य हमारे बीते हुए कर्मों का परिणाम है और आज के कर्म भविष्य का भाग्य बनाते हैं। इसलिए भाग्य और कर्म एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं।

यदि कोई विद्यार्थी पूरे वर्ष पढ़ाई न करे और परीक्षा में असफल हो जाए, तो वह इसे दुर्भाग्य नहीं कह सकता। उसका फेल होना उसके कर्मों का स्वाभाविक फल है। इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति ईमानदारी, परिश्रम और सदाचार का जीवन जीता है तो धीरे-धीरे उसका भाग्य भी उज्ज्वल होता जाता है।

हमारे सद्ग्रन्थों में "करमगति टारै नाहिं टरी" के सुंदर दृष्टांत:

हमारे वेद, पुराण, उपनिषद जैसे महान ग्रंथ "करमगति टारै नाहिं टरी" उक्ति पर आधारित घटनाओं और कहानियों से भरे पड़े हैं, जिनमें कुछ प्रसंग संक्षिप्त रूप से नीचे दिए जा रहे हैं। 

१) रामायण से सीख:

रामायण में भगवान श्रीराम स्वयं विष्णु के अवतार होते हुए भी वनवास गए। उन्हें पिता की आज्ञा का पालन करना पड़ा। माता सीता का हरण हुआ, लक्ष्मण को अनेक कष्ट सहने पड़े। यदि भगवान भी कर्म और धर्म के नियमों का सम्मान करते हैं, तो सामान्य मनुष्य उनसे ऊपर कैसे हो सकता है?

रावण अपने समय का सबसे बड़ा विद्वान, तपस्वी और शक्तिशाली राजा था, परंतु उसके अहंकार और अधर्म ने अंततः उसका विनाश कर दिया। यह कर्मफल का सबसे बड़ा उदाहरण है।

२) महाभारत का संदेश:

महाभारत का प्रत्येक पात्र कर्मफल का जीवंत उदाहरण है। दुर्योधन ने अन्याय, ईर्ष्या और अहंकार का मार्ग चुना। परिणामस्वरूप कौरव-वंश समूल नष्ट हो गया। दूसरी ओर युधिष्ठिर ने सत्य और धर्म का पालन किया। इसलिए अनेक कठिनाइयों के बाद अंततः विजय उन्हीं की हुई। कर्ण महान दानी और वीर थे, किंतु कुछ गलत निर्णयों और अधर्म का साथ देने के कारण उन्हें भी दुखद परिणाम भुगतने पड़े।

महाभारत हमें सिखाती है कि केवल क्षमता या प्रतिभा पर्याप्त नहीं है; सही कर्म भी आवश्यक हैं।

३) राजा हरिश्चन्द्र: कर्म और सत्य की अग्निपरीक्षा

“करमगति टारै नाहिं टरी” का भाव राजा हरिश्चन्द्र के जीवन में पूरी तरह दिखाई देता है। उनके जीवन में कैसी-कैसी कठिन परिस्थितियाँ आईं, राजपाट और वैभव छिन गया, परिवार से बिछोह हुआ और उन्हें श्मशान में सेवक बनकर भी कार्य करना पड़ा; लेकिन उन्होंने सत्य और अपने कर्तव्य का मार्ग नहीं छोड़ा। उनके लिए सत्य केवल बोलने की बात नहीं, बल्कि कर्म से निभाया जाने वाला धर्म था।

Source: Facebook

राजा हरिश्चन्द्र का जीवन हमें यह समझाता है कि कर्मों का फल और जीवन की परिस्थितियाँ हमेशा हमारे मनोनुकूल नहीं होतीं। मनुष्य हर परिस्थिति को टाल नहीं सकता, लेकिन उस परिस्थिति में उसका आचरण कैसा होगा, यह उसके अपने हाथ में है। विपरीत समय में भी सत्य का साथ देना ही उनके चरित्र की सबसे बड़ी शक्ति थी।

४) राजा नल और दमयंती की कथा:

राजा नल धर्मात्मा, न्यायप्रिय और प्रजावत्सल थे। किंतु उनकी एक छोटी-सी दुर्बलता, "जुए का आकर्षण" उनके जीवन में विपत्ति का कारण बनी। उन्होंने राज्य, वैभव और सुख खो दिया। वनवास, वियोग और अनेक कष्ट झेले। 

लेकिन उनके भीतर सत्य, पश्चाताप और धर्म जीवित रहा। उन्होंने अपने दोषों को स्वीकार किया, स्वयं को बदला और अंततः अपना राज्य तथा सम्मान पुनः प्राप्त किया। 

यह कथा बताती है कि बुरे कर्म दुख देते हैं, किंतु अच्छे कर्म और आत्मसुधार भविष्य को उज्ज्वल बना सकते हैं।

कर्मफल से कोई नहीं बचता

इतिहास गवाह है कि जिन्होंने दूसरों का शोषण किया, अन्याय किया या अहंकार में दूसरों को कष्ट पहुँचाया, उनका अंत कभी सुखद नहीं हुआ। दूसरी ओर अनेक ऐसे लोग भी हुए जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी सत्य और ईमानदारी का मार्ग नहीं छोड़ा। समय ने उन्हें सम्मान और सफलता दोनों दिए। इसलिए कहा गया है— "ईश्वर की अदालत में देर हो सकती है, अंधेर नहीं।"

क्या पूजा-पाठ कर्मफल बदल सकता है?

यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है। पूजा, जप, तप, ध्यान और प्रार्थना मनुष्य के भीतर सकारात्मक परिवर्तन लाते हैं। वे विवेक, धैर्य और आत्मबल प्रदान करते हैं। इनसे मनुष्य नए और श्रेष्ठ कर्म करने की प्रेरणा प्राप्त करता है।

यदि कोई व्यक्ति गलत कर्म करता रहे और केवल पूजा के बल पर उनके परिणाम से बचना चाहे, तो यह संभव नहीं है। हाँ, सच्चा पश्चाताप, आत्मसुधार और सत्कर्म भविष्य के जीवन की दिशा अवश्य बदल सकते हैं।

वर्तमान से ही भविष्य का निर्माण होता है:

मनुष्य के पास केवल वर्तमान क्षण है। बीता हुआ समय कभी  लौटकर नहीं आता। यदि आज हम ईमानदारी से कार्य करेंगे, दूसरों का सम्मान करेंगे, समय का सदुपयोग करेंगे और अपने कर्तव्यों का पालन करेंगे, तो हमारा भविष्य निश्चित रूप से उज्ज्वल होगा। आज का प्रत्येक छोटा-सा अच्छा कार्य आने वाले कल की बड़ी सफलता का आधार बनता है।

आधुनिक जीवन में कर्मफल सिद्धांत की आवश्यकता

आज समाज में तनाव, भ्रष्टाचार, प्रतिस्पर्धा, हिंसा और अविश्वास बढ़ रहा है। इसका प्रमुख कारण यह है कि लोग केवल परिणाम चाहते हैं, कर्म की शुद्धता पर ध्यान नहीं देते। यदि प्रत्येक व्यक्ति यह समझ ले कि उसके प्रत्येक कर्म का परिणाम निश्चित है, तो वह गलत कार्य करने से पहले कई बार सोचेगा।

  • व्यापारी, व्यापार में ईमानदारी बरतेगा।
  • शिक्षक पूरे मन से विद्यार्थियों को पढ़ाएगा।
  • चिकित्सक सेवा को सर्वोपरि मानेगा।
  • सरकारी कर्मचारी अपने दायित्वों का निष्ठा से पालन करेगा।
  • विद्यार्थी नियमित रूप से अध्ययन करेंगे।

यही कर्मयोग समाज को बेहतर बनाता है।

अच्छे कर्म करने के सरल उपाय

  • सदैव सत्य बोलने का प्रयास करें।
  • किसी के साथ छल या अन्याय न करें।
  • समय का सम्मान करें।
  • माता-पिता, गुरु और बुजुर्गों का आदर करें।
  • जरूरतमंद की यथाशक्ति सहायता करें।
  • अपने कार्य को ईश्वर की पूजा समझकर करें।
  • क्रोध, लोभ और अहंकार पर नियंत्रण रखें।
  • प्रतिदिन आत्मचिंतन करें कि आज मैंने कौन-से अच्छे और कौन-से गलत कर्म किए।

कर्म और आत्मसुधार

यदि जीवन में कभी गलतियाँ हुई हैं तो निराश होने की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि यदि वह दिल से चाहे तो वह स्वयं को बदल सकता है। 

गलत कर्मों को स्वीकार करना, उनसे सीखना और आगे से श्रेष्ठ आचरण अपनाना ही सच्चा प्रायश्चित है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति निराशा नहीं, बल्कि सुधार का मार्ग दिखाती है।

निष्कर्ष

"करमगति टारै नाहिं टरी" केवल एक कहावत नहीं, बल्कि जीवन का अटल सत्य है। संसार में धन, पद, शक्ति और प्रसिद्धि बहुत कुछ दिला सकते हैं, किंतु कर्मफल से मुक्ति नहीं दिला सकते।

अतः हमें भाग्य को दोष देने के बजाय अपने कर्मों को श्रेष्ठ बनाने का संकल्प लेना चाहिए। अच्छे विचार, उत्तम आचरण, परिश्रम, ईमानदारी, करुणा और सेवा ही उज्ज्वल भविष्य की सच्ची नींव हैं।

आइए, हम ऐसा जीवन जिएँ कि हमारे कर्म ही हमारी सबसे बड़ी पहचान बनें। क्योंकि अंततः मनुष्य अपने धन, पद या प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि अपने कर्मों से याद किया जाता है।

याद रखिए— "कर्म बीज है, भाग्य उसका फल है। आज जो बोएँगे, कल वही काटेंगे। इसलिए सत्कर्म कीजिए, क्योंकि 'करमगति टारै नाहिं टरी'।"

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