25 मार्च 2026

जैसे को तैसा: प्रेरणादायक कहानी और नैतिक शिक्षा

भूमिका:

जीवन एक ऐसा दर्पण है, जो हमें वही लौटाकर देता है जो हम उसमें दिखाते हैं। हमारे व्यवहार, हमारे जबान से निकले शब्द और हमारे कर्म—ये सभी किसी न किसी रूप में हमारे पास वापस आते ही हैं। इसी गहरे जीवन-सत्य को सरल शब्दों में समझाने वाला सिद्धांत है—“जैसे को तैसा”।

यह केवल एक कहावत नहीं, बल्कि मानव-संबंधों और सामाजिक व्यवहार का आधार है। जब हम दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करते हैं, तो हमें भी सम्मान और प्रेम मिलता है।

वहीं, यदि हम किसी के साथ अन्याय या बुरा व्यवहार करते हैं, तो वही व्यवहार किसी न किसी रूप में हमारे जीवन में लौटकर आता है। विदुर-नीति में भी कहा गया है, "शठे शाठ्यम् समाचरेत्" अर्थात् दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार उचित है। 

आज के समय में, जब रिश्तों में विश्वास और संवेदनशीलता कम होती जा रही है, “जैसे को तैसा” का सिद्धांत हमें यह सिखाता है कि हमें अपने कर्मों के प्रति सजग रहना चाहिए। यह हमें न्याय, संतुलन और जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाता है।

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इस ब्लॉग में दी गयी प्रेरक कहानियों और उनसे मिली सीख के माध्यम से हम “जैसे को तैसा” के इस सिद्धांत को गहराई से समझने का प्रयास करेंगे, ताकि हम अपने जीवन को और बेहतर बना सकें।

पंचतंत्र की प्रेरणादायक कहानियाँ: 

कहानी-१: चतुर बनियां और लालची महाजन 

एक गाँव में जीर्णधन नाम का एक बनियां रहता था। धनोपार्जन के लिए वह परदेश जाने का विचार किया। उसके घर में धन-सम्पत्ति के नाम पर केवल एक बहुत भारी लोहे का तराजू था। उसे अपने एक महाजन मित्र के पास धरोहर रखकर वह परदेश चला गया। परदेश से वापस आने के बाद उसने अपने महाजन दोस्त से अपनी धरोहर वापस मांगी। महाजन ने कहा, “क्या बतायें मित्र! वह लोहे की तराजू तो चूहे खा गये।"

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बनियां समझ गया कि महाजन के मन में पाप समा गया है इसीलिए वह उस तराजू को लौटाना नहीं चाहता। अब कोई उपाय भी नहीं था, क्योंकि उसकी कोई लिखा-पढ़ी तो हुई नहीं  थी। कुछ देर सोचकर उसने कहा, “कोई बात नहीं मित्र! लोहे की तराजू को अगर चुहों ने खा डाली तब भला इसमें तुम्हारा क्या दोष? ये तो सरासर चूहों का दोष है। इसके लिए तुम चिन्ता न करो” यह सुनकर महाजन बहुत खुश हुआ। 

दूसरे दिन बनियां फिर महाजन के पास आया और कहा, “मित्र! मैं नदी पर स्नान के लिए जा रहा हूँ। तुम अपने पुत्र धनदेव को मेरे साथ भेज दो, वह भी नहा आयेगा” लालची महाजन बनिये की सज्जनता से बहुत प्रभावित था, इसलिए उसने सहर्ष अपने पुत्र को बनिये के साथ नदी-स्नान के लिए भेज दिया। 

बनिये ने महाजन के पुत्र को वहाँ से काफी दूर ले जाकर एक गुफा में बन्द कर दिया और गुफा के द्वार पर बड़ी सी शिला रख दी ताकि वह निकलकर भाग न पाये। उसे वहाँ बंद करके जब वह महाजन के घर आया तो महाजन ने पूछा, “मेरा लड़का कहाँ है?" 

बनिये ने कहा, "क्या बताऊँ दोस्त, उसे नदी के किनारे बैठाकर पहले मैं जब स्नान करने गया तभी उसे चील उठा ले गई।" महाजन गुस्से में बोला, “यह कैसे हो सकता है? भला, चील कभी इतने बड़े बच्चे को उठा कर ले जा सकती है?”

बनियां शांत स्वर में जबाब दिया, “भले-आदमी! यदि चूहे, लोहे की भारी तराजू को खा सकते हैं तो चील बच्चे को उठाकर क्यों नहीं ले जा सकती है?" अब साफ-साफ सुन लो, "अगर तुझे बच्चा चाहिए तो अभी तराजू निकाल कर दे दे, वरना....”

इसी तरह झगड़ते हुए दोनों फरियाद के लिए राजदरबार में पहुँचे। वहाँ न्यायाधीश के सामने महाजन ने अपनी दुःख-कथा सुनाते हुए कहा कि, “इस बनिये ने मेरा लड़का चुरा लिया है"

न्यायाधीश ने बनिये से कहा, “इसका लड़का इसे वापस करो।" तब बनियां बड़ी विनम्रता से कहा, "महाराज! उसे तो चील उठा ले गई है।" न्यायाधीश ने कहा, "क्या चील कभी बड़े बच्चे को उठाकर ले जा सकती है?”

बनिये ने हाथ जोड़कर कहा, “श्रीमान जी! आप ही बतायें कि क्या लोहे की भारी तराजू को चूहे खा सकते हैं?" यदि भारी तराजू को चूहे खा सकते हैं तो चील बच्चे को उठाकर क्यों नहीं ले जा सकती है।"

न्यायाधीश के प्रश्‍न पर बनिये ने अपनी तराजू का सब वृत्तान्त विस्तार से कह सुनाया। सारा माजरा जानकर न्यायाधीश ने महाजन से बनिये का तराजू और बनिये से महाजन का बेटा तुरंत वापस करने का आदेश दिया। 

कहानी-२: चालाक लोमड़ी और सारस 

एक जंगल में लोमड़ी और सारस में मित्रता हो गयी। लोमड़ी चालाक और धूूर्त थी जबकि सारस सीधे स्वभाव का था। 

एक दिन लोमड़ी सारस को अपने घर दावत पर बुलायी। उसने खीर बनायी और बडे़ से प्लेट में परोसकर बोली, "खीर खाओ मित्र!" लम्बी चोंच  वाला सारस भला प्लेट में से खीर कैसे खा पाता? लोमड़ी, जल्दी-जल्दी पूरी खीर चट कर गयी। उपर से बोली, "खीर कैसी लगी मित्र?" सारस लोमड़ी की धूर्तता को समझ चुका था किन्तु बोला, "बड़ा ही स्वादिष्ट था।" 

सारस ने लोमड़ी के बुरे बर्ताव का जबाब देने हेतु उसने एक लम्बे गरदन वाली सुराही में पतला सूप बनाया और लोमड़ी को खाने पर आमंत्रित किया। लोमड़ी तो बहुत खुश हुयी कि अबकी बार फिर मैं ही फिर सारा खाना चट कर जाऊंगी और वह बेचारा सारस मेरा मुंह देखता रह जायेगा। 

लोमड़ी जब सारस के घर गयी तो सारस ने सूप वाली वही सुराही सामने रखते हुए बोला, "स्वादिष्ट सूप का आनंद लो मित्र!" सारस अपनी लम्बी चोंच से बड़े आराम से सुराही में से सूप पी रहा था, जबकि लोमड़ी उसका मुंह देख रही थी। लोमड़ी अब अच्छी तरह समय चुकी थी कि यह उसी के द्वारा किये गए बर्ताव का परिणाम था। 

सीख: दोस्तों! हम दूसरों के साथ जो व्यवहार करते हैं, वही व्यवहार एक दिन हमारे पास लौटकर जरूर आता है।

नैतिक शिक्षा (Moral of the Story): इन कहानियों से हमें कई महत्वपूर्ण सीख मिलती हैं;

१. जैसा करोगे वैसा भरोगे: आपका हर कर्म आपके पास वापस जरूर आता है, चाहे वह अच्छा हो या बुरा। जैसा कि रामचरितमानस में लिखा है, "कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करहि सो तस फल चाखा।"

२. व्यवहार ही आपकी पहचान है: आपका व्यवहार ही तय करता है कि लोग आपको कैसे देखते हैं।

३. बदलाव हमेशा संभव है: अगर आप अपनी गलती समझ लें, तो खुद को बदलने में देर नहीं होती।

४. दूसरों की मदद करें: आज आप किसी की मदद करेंगे, तो कल कोई आपकी मदद जरूर करेगा।

सकारात्मक जीवन के लिए महत्वपूर्ण सुझाव

१. हमेशा अच्छा सोचें: आपकी सोच ही आपके व्यवहार को तय करती है।

२. दूसरों की मदद करें: छोटी-छोटी मदद भी बड़ा फर्क ला सकती है।

३. ईमानदार रहें: ईमानदारी सबसे बड़ी ताकत है।

४. गुस्से पर नियंत्रण रखें: गुस्सा रिश्तों को खराब करता है।

निष्कर्ष (Conclusion):

"जैसे को तैसा" सिर्फ एक कहावत नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका है। यह हमें सिखाता है कि हमारे कर्म और व्यवहार ही हमारे भविष्य को तय करते हैं। अगर हम अपने जीवन में खुशियाँ, सम्मान और सफलता चाहते हैं, तो हमें दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करना होगा।

👉 आप दुनियाँ को जो भी देते हैं, वही दुनियाँ आपको वापस देती है। जैसा व्यवहार आप दूसरों से चाहते हैं, वैसा ही व्यवहार खुद भी करें। 

महत्वपूर्ण संदेश: आज से ही अपने व्यवहार में छोटा सा बदलाव लाएँ। जरूरतमंदों की मदद करें। विनम्र बनें और सकारात्मक सोच रखें। 

धीरे-धीरे आप देखेंगे कि आपकी जिंदगी खुद-ब-खुद बेहतर होती जा रही है।

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