भूमिका
मानव जीवन में सफलता और असफलता का प्रश्न जितना पुराना है, उतनी ही पुरानी यह बहस भी है कि जीवन को भाग्य चलाता है या पुरुषार्थ। जैसा कि कहा जाता है, "कोई लाख करे चतुराई, करम का लेख मिटे ना भाई"। इस तरह कुछ लोग हर घटना को भाग्य का खेल मानते हैं, जबकि कुछ लोग भाग्य को संचित कर्म जानकर यह मानते हैं कि मनुष्य का भाग्य उसके कर्मों से बनता है।
गोस्वामी तुलसीदास जी की प्रसिद्ध उक्ति "दैव-दैव कर आलसी पुकारा" इस भ्रम को दूर करती है। इसका स्पष्ट संदेश है कि आलसी व्यक्ति अपनी निष्क्रियता को छिपाने के लिए बार-बार भाग्य का सहारा लेता है, जबकि कर्मयोगी व्यक्ति परिस्थितियों से संघर्ष करके अपना मार्ग स्वयं बनाता है।
आज के समय में भी अनेक लोग यह कहते हुए दिखाई देते हैं, "मेरी किस्मत खराब है", "यदि भाग्य साथ देता तो मैं भी सफल हो जाता।" वास्तव में भाग्य तभी साथ देता है जब मनुष्य स्वयं मेहनत करता है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है, "उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी:" अर्थात् लक्ष्मी भी उद्योगी और पराक्रमी पुरुष के यहाँ आती हैं।"
यह ब्लॉग हमें सिखाता है कि, "भाग्य से अधिक महत्वपूर्ण पुरुषार्थ है और आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।"
“दैव-दैव कर आलसी पुकारा” पंक्ति की पूरी चौपाई और उसका अर्थ
नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव-दैव कर आलसी पुकारा॥
प्रसंग: यह चौपाई रामचरितमानस के सुंदरकांड में वर्णित है। जब प्रभु श्रीराम जी अपनी वानरी सेना के साथ समुद्र तट पर पार उतरने के लिए समुद्र से रास्ता की आस लगाये खड़े हैं। तब उनके भ्राता लक्ष्मण जी उनसे भाग्य को छोड़, पुरुषार्थ करने की उन्हें सलाह देते हैं।
अर्थ: लक्ष्मण जी, श्रीराम जी से कहते हैं, "हे नाथ! दैव अर्थात् भाग्य का क्या भरोसा? यह तो कायर पुरुषों के मन की तसल्ली का आधार है। दैव-दैव तो आलसी लोग पुकारा करते हैं इसलिए आप समुद्र पर क्रोध करके उसे अपने घातक बाणों से उसे सुखा दिजिए।
भावार्थ: " दैव-दैव कर आलसी पुकारा" का अर्थ है कि आलसी व्यक्ति हर बात में भाग्य को दोष देता है। वह अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए किस्मत का नाम लेता रहता है।
जब कोई व्यक्ति मेहनत नहीं करता, समय का सही उपयोग नहीं करता, अपने लक्ष्य के प्रति गंभीर नहीं होता, तब उसकी असफलता निश्चित होती है। लेकिन वह अपनी गलती स्वीकार करने के बजाय अपने भाग्य को दोष देता है। इसके विपरीत कर्मयोगी, पुरुषार्थी व्यक्ति परिस्थितियों से नहीं डरता। वह हर कठिनाइयों के बावजूद मेहनत करता है और अंततः सफलता प्राप्त करता है।
भाग्य और पुरुषार्थ का संबंध
भाग्य और पुरुषार्थ दोनों का जीवन में महत्व है और उनमें गहरा संबंध भी है। भाग्य, पूर्व जन्म के संचित कर्म होते हैं। संचित कर्म के रूप में अच्छे कर्म जितने प्रभावशाली होते हैं, उतना ही भाग्य प्रबल होता है। आखिरकार बात वहीं आती है कि भाग्य भी कर्म या पुरुषार्थ पर निर्भर करता है और भाग्य केवल उसी का साथ देता है जो पुरुषार्थ करता है।
यदि किसान खेत में बीज न बोए और केवल भाग्य के भरोसे बैठा रहे, तो क्या फसल उग सकती है? बिल्कुल नहीं। इसी प्रकार विद्यार्थी यदि पढ़ाई न करे और परीक्षा में अव्वल दर्जे से पास की उम्मीद करे, तो यह संभव नहीं है।
पुरुषार्थ वह शक्ति है जो भाग्य को भी बदल सकती है। इतिहास में अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ लोगों ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने प्रयासों से महान सफलता प्राप्त की।
आलस्य, मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है
महर्षि भर्तृहरि द्वारा रचित 'नीतिशतकम्' में एक श्लोक है—
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महारिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कुर्वाणो नावसीदति ॥
अर्थ: आलस्य, मनुष्य के शरीर में रहने वाला सबसे बड़ा शत्रु है। इसके समान कोई दूसरा शत्रु नहीं है। इसके विपरीत, उद्यम (परिश्रम और पुरुषार्थ) से बढ़कर मनुष्य का कोई सच्चा मित्र नहीं है। जो व्यक्ति निरंतर परिश्रम करता रहता है, वह कभी निराश नहीं होता, न ही जीवन में पतन का सामना करता है। उसका पुरुषार्थ ही उसे बड़ी से बड़ी कठिनाइयों से उबारकर सफलता और सम्मान की ओर ले जाता है।
भावार्थ: यह श्लोक हमें सिखाता है कि आलस्य व्यक्ति की प्रतिभा, समय और अवसरों का सबसे बड़ा विनाशक है, जबकि परिश्रम, लगन और सतत प्रयास जीवन की उन्नति का सबसे विश्वसनीय आधार हैं। इसलिए सफलता प्राप्त करने के लिए आलस्य का त्याग कर पुरुषार्थ को अपना जीवन-सिद्धांत बनाना चाहिए।
आलस्य के प्रमुख नुकसान
आलस्य केवल समय की बर्बादी नहीं करता, बल्कि व्यक्ति के व्यक्तित्व, स्वास्थ्य और भविष्य को भी प्रभावित करता है। इसके प्रमुख नुकसान निम्नलिखित हैं—
१. सफलता में बाधा – आलसी व्यक्ति आवश्यक कार्य समय पर नहीं कर पाता, जिससे सुअवसर भी हाथ से निकल जाते हैं।
२. समय की बर्बादी – आलस्य के कारण बहुमूल्य समय व्यर्थ चला जाता है, जिसे वापस नहीं लाया जा सकता।
३. आर्थिक हानि – काम में लापरवाही और टालमटोल से आय के अवसर कम हो जाते हैं।
४. मानसिक तनाव – अधूरे कार्यों का बोझ चिंता, अपराधबोध और तनाव को बढ़ाता है।
५. स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव – शारीरिक निष्क्रियता से मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और अन्य अनेक रोगों का खतरा बढ़ जाता है।
६. आत्मविश्वास में कमी – बार-बार असफल होने से व्यक्ति का आत्मविश्वास और उत्साह घटने लगता है।
७. प्रतिभा का क्षय – आलस्य के कारण व्यक्ति अपनी क्षमताओं का पूरा उपयोग नहीं कर पाता।
८. सम्मान में कमी – परिवार, समाज और कार्यस्थल पर आलसी व्यक्ति की विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा कम हो जाती है।
९. अच्छी आदतों का नाश – आलस्य अनुशासन, समयपालन और नियमितता जैसी अच्छी आदतों को कमजोर कर देता है।
१०. जीवन में पछतावा – समय बीत जाने पर व्यक्ति को यह महसूस होता है कि यदि उसने समय रहते परिश्रम किया होता, तो वह कहीं अधिक सफल हो सकता था।
कर्म ही सफलता की कुंजी है
भारतीय संस्कृति सदैव कर्मप्रधान रही है। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं— “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”। अर्थात मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल पर नहीं। इससे हमें शिक्षा मिलती है कि परिणाम की चिंता में समय नष्ट करने के बजाय पूरी निष्ठा और ईमानदारी से अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। फल समय आने पर अवश्य प्राप्त होता है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामचरितमानस में लिखा है, "सकल पदारथ एहि जग माहीं, करमहीन नर पावत नाहीं"
यह संदेश हमें सिखाते हैं कि हमें पूरी ईमानदारी और मेहनत से अपना कार्य करना चाहिए। सफलता देर से मिले या जल्दी, लेकिन मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती।
तुलसीदास जी ने एक स्थल पर यह भी लिखा है, कर्मप्रधान विश्व करि राखा, जो जस करहिं सो तस फल चाखा। अर्थात् यह संसार कर्मभूमि है, यहाँ कर्म ही प्रधान है। अच्छा या बुरा, जो जैसा कर्म करता है उसे उसके कर्म के अनुरूप वैसा ही फल भी मिलता है।
कहने का मूल आशय यह है कि भगवान भी उसी की सहायता करते हैं जो प्रयास के लिए स्वयं उद्यत रहते हैं (God helps those, who helps themselves)।
भाग्य को दोष देना क्यों गलत है?
दोषारोपण इंसानी फ़ितरत है। जब अच्छा होता है तब उसका श्रेय तो खुद लेता है लेकिन जब बुरा होता है, असफल होता है तब वह खुद को या खुद के कर्मों को गलत नहीं मानता बल्कि अपने भाग्य को कोसने लगता है।
यह दृष्टिकोण न केवल गलत है बल्कि आत्मविकास में भी सबसे बड़ी बाधा बन जाता है। भाग्य को दोष देने से व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों से बचने का प्रयास करता है और अपनी कमियों को सुधारने के बजाय परिस्थितियों को दोषी ठहराता रहता है।
इससे आत्मविश्वास घटता है, पुरुषार्थ की भावना कमजोर पड़ती है और प्रगति के सभी द्वार धीरे-धीरे बंद होने लगते हैं। वह जिम्मेदारी से भागता है। भाग्यवाद, मनुष्य को कमजोर बनाता है और ऐसा व्यक्ति दूसरों पर आश्रित रहने लगता है।
वास्तव में, भाग्य हमारे जीवन की प्रत्येक घटना का एकमात्र निर्धारक नहीं है। हमारे विचार, निर्णय, परिश्रम, अनुशासन और निरंतर प्रयास भी सफलता-असफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए भाग्य को दोष देने के बजाय अपनी ऊर्जा आत्म-सुधार, परिश्रम और सकारात्मक प्रयासों में लगानी चाहिए।
भाग्य भी मेहनत करने वालों का ही चमकता है
दुनियाँ के अधिकांश लोग अपने परिश्रम के बल पर सफलता प्राप्त किये हैं। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, गरीब परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने कठिन परिश्रम किया और भारत के महान वैज्ञानिक एवं सर्वप्रिय राष्ट्रपति बने।
स्वामी विवेकानंद को लें, उन्होंने संघर्षों के बावजूद हार नहीं मानी और अपने ज्ञान एवं पुरुषार्थ से पूरी दुनियाँ को भारतीय संस्कृति का लोहा मनवाया।
जीवन में तमाम असफलताओं के बावजूद सफलता के संदर्भ में वैज्ञानिक थॉमस एडीसन का नाम पहले लिया जाता है। उन्होंने हजारों बार असफल होने के बाद भी प्रयास नहीं छोड़ा और बल्ब का आविष्कार किया। यदि वे भाग्य को दोष देकर बैठ जाते, तो शायद दुनियाँ आज भी अंधकार में होती।
आलस्य से दूरी बनाकर, क्रियाशील रहने के प्रभावी उपाय
जीवन का सबसे बड़ा सत्य यह है कि कर्म के बिना कुछ संभव नहीं। आलस्य से दूरी बनाकर क्रियाशील रहने के कुछ प्रमुख उपाय निम्न हैं—
१. स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित करें: जिस व्यक्ति का लक्ष्य स्पष्ट होता है, वह अधिक प्रेरित रहता है।
२. समय का महत्व समझें: समय सबसे मूल्यवान संपत्ति है। जो समय का सम्मान करता है, सफलता उसी के कदम चूमती है।
३. छोटी ही, परंतु शुरुआत जरूर करें: बड़े काम को छोटे भागों में बाँटकर शुरू करें।
४. प्रेरणादायी लोगों के साथ रहें: प्रेरणादायक लोगों का साथ व्यक्ति को आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। जैसा कि शास्त्रों में उल्लेख है, "सत्संगति: कथय किं न करोति पुंषाम्" अर्थात् सत्संगति पुरुषों के लिए क्या नहीं कर सकती है?
5. अपनी दिनचर्या खुद बनाएं और उसका पालन करें: अनुशासन, इसका सबसे बड़ा उपचार है।
६. व्यायाम-योग करें: इससे मन और शरीर दोनों को ऊर्जावान बनते हैं।
७. स्वयं को प्रेरित करें: प्रतिदिन अच्छे विचार पढ़ें, सुनें और अपने लक्ष्य को याद रखें।
निष्कर्ष
दैव-दैव कर आलसी पुकारा" केवल एक कहावत नहीं, बल्कि जीवन का अटल सत्य है। भाग्य पर विश्वास रखना अच्छी बात है, किन्तु भाग्य के भरोसे बैठ जाना जीवन की सबसे बड़ी भूल है। ईश्वर उसी व्यक्ति का साथ देता है जो पुरुषार्थ करता है। "भाग्य अवसर देता है, लेकिन पुरुषार्थ उसे उपलब्धि में बदलता है।"
इसलिए आज ही आलस्य का त्याग कीजिए, पुरुषार्थ को अपना जीवन-मंत्र बनाइए और अपने कर्मों से ऐसा भविष्य बनाइए कि लोग उसे कहें कि "भाग्य हो तो ऐसा।" यही इस उक्ति का वास्तविक संदेश है और यही सफलता का अचूक सूत्र भी।
Must read:
- समय की कीमत : समय का महत्व और सफलता के सूत्र
- सफलता के नियम। सफलता के मूल मंत्र
- जीवन में अनुशासन क्यों जरूरी है?
- मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है।
- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्
- उद्यमेन ही सिद्धयंन्ति कार्याणि न मनोरथैः
- कर्म पर गीता के प्रमुख श्लोक
- संगति; जीवन में महत्व
- कर्म-प्रभाव और फल। कर्मफल का सिद्धांत
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