भूमिका:
मनुष्य का जीवन सुख-दुःख, सफलता-असफलता, आशा-निराशा और उतार-चढ़ाव से भरा हुआ है। कभी परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल होती हैं तो कभी अचानक ऐसी समस्याएँ सामने आ जाती हैं, जिनसे निकलने का कोई रास्ता दिखाई नहीं देता। ऐसे समय में हम स्वभावतः घबरा जाते हैं, चिंता करने लगते हैं और बार-बार यही सोचते हैं कि “आखिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है?”
ईश्वर हर संकट को हमारी इच्छा के अनुसार तुरंत समाप्त कर दें, यह जरूरी नहीं है। कई बार सामने आये संकट को समाप्त करने का उनका तरीका अनोखा हो सकता है जैसे कि हमें समस्या से लड़ने की शक्ति, सही निर्णय लेने की बुद्धि और परिस्थितियों को स्वीकार करने का धैर्य प्रदान करते हैं।
इसलिए ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति केवल सुख के समय धन्यवाद देने में नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी यह विश्वास बनाए रखने में है कि— “जो हो रहा है, उसमें भी कोई न कोई हमारा कल्याण छिपा हो सकता है और ईश्वर मुझे इस परिस्थिति से भी पार लगाने का मार्ग अवश्य दिखाएँगे।”
हमें संकट के समय ही ईश्वर क्यों याद आते हैं?
सामान्य दिनों में जब हम अपने काम, परिवार, धन, भविष्य और इच्छाओं में व्यस्त रहते हैं तब प्रायः हमें लगता है कि सब कुछ तो हम कर रहे हैं। उस समय हमारे अन्दर "कर्तापन अर्थात् अहं का भाव" रहता है। तब हमें ईश्वर की सुधि नहीं आती।" लेकिन जब जीवन में कोई बड़ा संकट आता है, जैसे कि गंभीर बीमारी, आर्थिक परेशानी, रिश्तों में तनाव, नौकरी का संकट, असफलता या किसी प्रिय व्यक्ति से बिछड़ने जैसी परिस्थितियाँ आती हैं और हम जब पूरी तरह असहाय महसूस करने लगते हैं उस समय हमें ईश्वर की याद आती है और तब हम हाथ जोड़कर विनती करते हैं, “हे प्रभु! अब सब कुछ आपके भरोसे है और संकट से पार लगाओ।”
वास्तव में प्रार्थना का यही भाव सबसे सरल और सच्चा है। जब मनुष्य अपने अहंकार को पीछे रखकर ईश्वर पर विश्वास करना सीखता है, तब उसके भीतर एक अद्भुत शांति पैदा होने लगती है। ईश्वर पर विश्वास का अर्थ हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाना नहीं है। ईश्वर पर विश्वास करने का अर्थ यह भी नहीं है कि हम अपने कर्तव्यों और प्रयासों को छोड़ दें और केवल यह प्रतीक्षा करें कि ईश्वर सब कुछ ठीक कर देंगे।
ईश्वर में विश्वास का सही अर्थ है— “मैं अपना सर्वोत्तम प्रयास (Best effort) करूँगा और परिणाम को ईश्वर पर छोड़ दूँगा।” यदि बीमारी है तो उपचार कराना हमारा कर्तव्य है। यदि आर्थिक संकट है तो खर्चों को नियंत्रित करना और आय बढ़ाने का प्रयास करना हमारा कर्तव्य है। यदि रिश्तों में समस्या है तो समझदारी से संवाद करके उसे सुधारने का प्रयास करना हमारा कर्तव्य है। इसी तरह जीवन में यदि कोई कठिन परिस्थिति आये तो धैर्य, विवेक और साहस के साथ उसका सामना करना भी हमारा कर्तव्य है।
ईश्वर पर विश्वास हमें कर्म से दूर नहीं करता; बल्कि सही कर्म करने की शक्ति देता है।
संकट में भी ईश्वर का आभार क्यों व्यक्त करना चाहिए?
संकट के समय आभार व्यक्त करना पहली दृष्टि में कठिन लगता है क्योंकि जब जीवन में परेशानी हो तो ये लगता है कि आखिर ईश्वर को किस बात के लिए धन्यवाद दें? लेकिन यदि हम थोड़ा रुककर देखें तो पाएँगे कि संकट के बीच भी हमारे पास ऐसी अनेक चीजें मौजूद होती हैं जिनके लिए हम ईश्वर के प्रति कृतज्ञ हो सकते हैं। जैसे कि— हमारे पास बहुमूल्य जीवन है और उसके लिए अनगिनत सांसें भी हैं। परिवार और कुछ अच्छे लोगों का साथ भी है। सोचने-समझने तथा निर्णय लेने की क्षमता के साथ नई शुरुआत करने के अवसर भी हैं।
कृतज्ञता का अर्थ यह नहीं कि हम अपनी समस्या को नकार दें। इसका अर्थ केवल इतना है कि समस्या के साथ-साथ हम उन अच्छाइयों को भी देखना सीखें, जो हमारे जीवन में पहले से ही मौजूद हैं। यही दृष्टिकोण मनुष्य को टूटने से बचाता है।
“धन्यवाद” केवल शब्द नहीं, एक भाव है।
हम अक्सर ईश्वर से प्रार्थना करते समय अपनी इच्छाओं की लंबी सूची प्रस्तुत करते हैं,जैसे—
- “हे भगवान! मेरा अमुक काम बना दीजिए।”
- “मेरी परेशानी दूर कर दीजिए।”
- “मुझे सफलता दे दीजिए।”
- “मेरी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण कर दीजिए।”
लेकिन बहुत बार हम बिना उनसे कुछ माँगे, केवल यह भी तो कह सकते हैं— “हे प्रभु! आपने अब तक जो कुछ दिया, उसके लिए आपका धन्यवाद।” यही सच्ची कृतज्ञता है। ईश्वर के प्रति आभार केवल मंदिर में जाकर हाथ जोड़ने तक सीमित नहीं होना चाहिए। यदि हमारे मन में कृतज्ञता है तो वह हमारे व्यवहार में भी दिखाई देनी चाहिए।
माता-पिता के प्रति सम्मान, परिवार के प्रति प्रेम, दीन-दुखी और असहाय लोगों की सहायता, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन भी ईश्वर के प्रति आभार का एक रूप है।
कई बार संकट हमारे भीतर छिपी शक्तियों को उजागर करता है।
हम अक्सर चाहते हैं कि हमारे जीवन में कोई परेशानी न आए। लेकिन कठिन परिस्थितियाँ कभी-कभी हमें ऐसी शक्ति से रूबरू कराती हैं, जिसके बारे में हमें खुद भी पता नहीं होता। एक व्यक्ति सामान्य परिस्थितियों में बहुत कमजोर दिखाई दे सकता है, लेकिन संकट आने पर वही व्यक्ति अद्भुत धैर्य दिखा सकता है। किसी आर्थिक संकट से गुजरने वाला व्यक्ति मेहनत और अनुशासन का महत्व सीख सकता है। किसी असफलता से गुजरने वाला व्यक्ति अपनी गलतियों को समझकर उसे सुधार सकता है। किसी रिश्ते में आए कड़वाहट से व्यक्ति संवाद और संवेदनशीलता का महत्व सीख सकता है।
इसलिए हर संकट केवल परेशानी का कारण लेकर नहीं आता। वह अपने साथ कोई सीख, कोई अनुभव और कोई नई संभावना भी लेकर आ सकता है।
ईश्वर हमारी इच्छा नहीं, हमारा कल्याण देखते हैं।
मनुष्य अक्सर ईश्वर से वही चाहता है जो उसे उस समय अच्छा लगता है। लेकिन हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि हमारी दृष्टि सीमित है। हम केवल वही देख पाते हैं जो हमारे सामने मौजूद होता है; ईश्वर की व्यवस्था को हम पूरी तरह नहीं समझ सकते। कभी-कभी जिस चीज के लिए हम बहुत परेशान होते हैं, समय बीतने पर समझ आता है कि उसका न होना ही हमारे लिए बेहतर था। कभी कोई अवसर हाथ से निकल जाता है और हमें लगता है कि जीवन में बहुत बड़ा नुकसान हो गया। लेकिन बाद में कोई दूसरा रास्ता खुलता है, जो हमारे लिए पहले से कहीं और अधिक उपयोगी साबित होता है।
इसलिए हर परिस्थिति पर तुरंत निर्णय देना उचित नहीं है। जो आज संकट दिखाई दे रहा है, संभव है कि वही कल किसी नए अवसर का कारण बन जाए।
प्रभु की कृपा, अहैतुकी होती है:
प्रभु की कृपा अहैतुकी होती है, अर्थात् वह किसी विशेष कारण, योग्यता या स्वार्थ पर निर्भर नहीं होती। मनुष्य अपने कर्मों, प्रयासों और साधना के आधार पर बहुत कुछ प्राप्त कर सकता है, लेकिन प्रभु की कृपा करने की व्यवस्था दिव्य है। उनकी कृपा की बरसात हम पर कब और किस रूप में होगी, यह हमें पता नहीं चलता।
कई बार जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं, जब हमारे सभी रास्ते हमें बंद दिखाई देते हैं। प्रयास असफल होते हैं और उम्मीद भी कमजोर पड़ने लगती है। तभी अचानक कोई अनपेक्षित रास्ता खुल जाता है, कोई सहारा मिल जाता है या समस्या का समाधान खुद-बा-खुद सामने आ जाता है। प्रभु के कृपा करने के इस प्रकार के तरीके को ही प्रभु की अहैतुकी कृपा कहते हैं।
इसलिए हमें सुख में अहंकार और दुःख में निराशा नहीं करनी चाहिए। विश्वास रखें कि प्रभु हमारे जीवन में जो कुछ देते हैं, उसके पीछे कोई न कोई हमारा कल्याण छिपा होता है। हमारा कर्तव्य है— "सच्चे मन से कर्म करते रहें, प्रभु पर विश्वास रखें और हर परिस्थिति में उनका आभार व्यक्त करें।"
संकट में भी सकारात्मक दृष्टिकोण कैसे बनाए रखें?
संकट आने पर प्रायः धैर्य डगमगा जाता है और सकारात्मक बने रहना आसान नहीं होता। इसके लिए कुछ छोटे-छोटे अभ्यास उपयोगी हो सकते हैं;
१. समस्या को स्वीकार करें: सबसे पहले यह स्वीकार करें कि समस्या को नकारने से वह समाप्त नहीं होती। इसके लिए अपने आप से कहें— “हाँ, परिस्थिति कठिन तो है, लेकिन मैं इसका सामना कर सकता हूँ।”
२. जो आपके वश में है, उसी पर ध्यान दें: हर समस्या हमारे वश में नहीं होती लेकिन जो वश में है उस पर ईमानदारी से काम करें और जो हमारे वश के बाहर है, उस पर व्यर्थ की चिंता छोड़ दें।
३. प्रतिदिन आभार व्यक्त करें: रात को सोने से पहले तीन ऐसी चीजें याद करें जिनके लिए आप ईश्वर के आभारी हैं। वे बहुत छोटी या साधारण भी हो सकती हैं। जैसे— “आज परिवार के साथ समय मिला।” “आज किसी ने मेरी मदद की।” “आज मेरा दिन बड़ा ही शांतिपूर्ण रहा।” यह छोटा अभ्यास मन की दिशा बदल सकता है।
४. प्रार्थना के साथ प्रयास भी करें: सिर्फ प्रार्थना ही नहीं, ईश्वर पर भरोसा रख, अपना प्रयास जारी रखें।
५. अच्छे लोगों का साथ रखें: कठिन समय में नकारात्मक लोगों की बातें मन को और कमजोर कर सकती हैं, इसलिए ऐसे लोगों के साथ रहें जो आपको आशा, साहस और सही सलाह दें।
ईश्वर का आभार केवल सुख में ही नहीं, दुःख में भी होना चाहिए।
सुख में ईश्वर को धन्यवाद देना आसान है। जब सब कुछ हमारी इच्छा के मुताबिक हो रहा हो, तब कहना— “हे प्रभु, आपका बहुत धन्यवाद।” बहुत सरल है। लेकिन जब परिस्थितियाँ विपरीत हों, तब भी ईश्वर के प्रति वही विश्वास बनाए रखना ही वास्तविक श्रद्धा की परीक्षा है।
इसका अर्थ यह नहीं कि हमें दुःख में भी प्रसन्न होने का नाटक करना चाहिए। दखद् स्थिति में दुखी होना स्वाभाविक है। लेकिन उस दुःख के बीच भी मन के किसी कोने में यह विश्वास बना रहे— “यह समय भी बीत जाएगा।” यही विश्वास हमें टूटने से बचाता है।
कृतज्ञ व्यक्ति जीवन में अधिक संतुष्ट क्यों रहता है?
जिस व्यक्ति को सब समय केवल अभाव ही दिखता है, वह बहुत कुछ होते हुए भी दुखी रह सकता है। लेकिन जो व्यक्ति यह देखता है कि उसके पास तो बहुत कुछ है, वह सीमित संसाधनों में भी संतुष्टि का अनुभव कर सकता है।
कृतज्ञता हमारी दृष्टि बदल देती है। हम शिकायतों की जगह संभावनाएँ देखने लगते हैं। तुलना की जगह संतोष आने लगता है। असंतोष की जगह शांति आती है और धीरे-धीरे हमें यह समझ आने लगता है कि जीवन केवल उपलब्धियों का नाम नहीं है। जीवन उन छोटी-छोटी खुशियों को पहचानने का नाम भी है, जिन्हें हम अक्सर बड़ी इच्छाओं के पीछे भागते हुए अनदेखा कर देते हैं।
मुश्किल की घड़ी में यह प्रार्थना करें:
जब जीवन में संकट हो और मन बहुत परेशान हो, तब कुछ क्षण शांत होकर ईश्वर से कहें— “हे प्रभु! मुझे केवल संकट से निकालने की शक्ति ही नहीं, बल्कि संकट को समझने की बुद्धि भी दीजिए। जो मेरे वश में है उसे करने का साहस दीजिए और जो मेरे वश में नहीं है उसे स्वीकार करने का धैर्य भी दीजिए। मेरे मन में विश्वास बनाए रखिए और मुझे ऐसा मार्ग दिखाइए जो मेरे तथा दूसरों के लिए कल्याणकारी हो। आपने अब तक जो कुछ दिया है, उसके लिए मैं आपका हृदय से आभारी हूँ।”
ऐसी प्रार्थना मन को भीतर से मजबूत कर सकती है। आभार, जीवन को देखने का नया नजरिया देता है। आभार का भाव धीरे-धीरे हमारी सोच बदल देता है। हम समझने लगते हैं कि हर दिन केवल पाने के लिए नहीं है; कुछ देने के लिए भी है। हर संबंध केवल अपेक्षा के लिए नहीं है; प्रेम और सहयोग के लिए भी है। हर परिस्थिति केवल शिकायत करने के लिए नहीं है; उससे सीखने के लिए भी है और हर संकट केवल डरने के लिए नहीं है; वह हमें भीतर से मजबूत बनाने का अवसर भी हो सकता है।
जब यह दृष्टिकोण विकसित होता है तो जीवन की कठिनाइयाँ पूरी तरह समाप्त भले न हों, लेकिन उन्हें देखने का हमारा तरीका अवश्य बदल जाता है।
निष्कर्ष:
जीवन में संकट आएँगे, परिस्थितियाँ बदलेंगी और कभी-कभी रास्ते भी बंद दिखाई देंगे। लेकिन सच्ची आस्था हमें यह विश्वास देती है कि ईश्वर हमें हर कठिनाई से पार पाने की शक्ति और सही मार्ग अवश्य दिखाते हैं। इसलिए सुख हो या दुख, सफलता हो या संघर्ष—हमें हर परिस्थिति में उनका दिल से आभार प्रकट करना चाहिए। क्योंकि कृतज्ञ हृदय में भय कम और विश्वास अधिक होता है।
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