इक्कीसवीं सदी को ऊर्जा परिवर्तन (Energy Transition) की सदी कहा जा रहा है। बढ़ती जनसंख्या, औद्योगिकीकरण, ऊर्जा की बढ़ती मांग तथा जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौतियों ने दुनियाँ को जीवाश्म ईंधनों (कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस) पर निर्भरता कम करने के लिए प्रेरित किया है। इसी कारण नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) आज विश्व की प्राथमिकता बन गई है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जलविद्युत, बायोमास तथा हरित हाइड्रोजन जैसे स्रोत, भविष्य की ऊर्जा-व्यवस्था के आधार माने जा रहे हैं।
भारत भी इस वैश्विक परिवर्तन का प्रमुख भागीदार है। पिछले एक दशक में भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है और आज विश्व के अग्रणी देशों में शामिल हो चुका है। भारत ने सन् २०३० ई. तक ५०० गीगावाट गैर-जीवाश्म (Non-Fossil) ऊर्जा-क्षमता का लक्ष्य निर्धारित किया है, जिसकी दिशा में तीव्र गति से कार्य हो रहा है।
नवीकरणीय और अनवीकरणीय ऊर्जा-स्रोत क्या हैं?
नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत (Renewable Energy Sources) वे ऊर्जा स्रोत हैं जो प्रकृति में लगातार पुनः उत्पन्न होते रहते हैं और समाप्त नहीं होते। इनमें मुख्य रूप से सौर-ऊर्जा, पवन-ऊर्जा, जलविद्युत ऊर्जा, बायोमास ऊर्जा तथा भू-तापीय ऊर्जा शामिल हैं। ये स्रोत पर्यावरण के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित होते हैं और काफी कम प्रदूषण फैलाते हैं।
अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोत (Non-Renewable Energy Sources) वे स्रोत हैं जिनका भंडार सीमित होता है और एक बार उपयोग होने के बाद इन्हें पुनः प्राप्त करने में लाखों वर्ष लग सकते हैं। इनमें कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस तथा परमाणु ईंधन (यूरेनियम) प्रमुख हैं। वर्तमान में विश्व की अधिकांश ऊर्जा आवश्यकताएँ इन्हीं स्रोतों से पूरी होती हैं, लेकिन इनके अत्यधिक उपयोग से प्रदूषण, जलवायु-परिवर्तन तथा संसाधनों के समाप्त होने का खतरा बढ़ रहा है।
इसलिए भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के लिए नवीकरणीय ऊर्जा-स्रोतों का उपयोग बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है।
नवीकरणीय ऊर्जा की मांग के प्रमुख कारण:
१. जनसंख्या-वृद्धि के कारण ऊर्जा की खपत का दिनोदिन बढ़ना।
२. परंपरागत ऊर्जा-स्रोतों का आज जिस प्रकार दोहन हो रहा है उससे इन स्रोतों का एक न एक दिन समाप्त हो जाने का अंदेशा।
३. कोयले, डीजल और पेट्रोल की बढ़ती मांग से उसकी कीमतों का दिनोदिन बढ़ना।
४. सबसे बड़ा कारण ग्रीन-हाउस गैसों के उत्सर्जन से ग्लोबल वार्मिंग का बढ़ना और इसके परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन की विकट समस्या का होना।
५. नवीकरणीय ऊर्जा-स्रोतों से ऊर्जा उत्पादन और संग्रहण से संबंधित तकनीक में निरंतर सुधार होने के कारण नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन की लागत में कमी होना।
६. सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के द्वारा नवीकरणीय ऊर्जा प्रोजेक्ट्स को वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करना।
७. जनता की जागरूकता और चिंताएँ भी नवीकरणीय ऊर्जा की ओर इशारा कर रही हैं।
भारत में नवीकरणीय ऊर्जा की वर्तमान स्थिति
वर्ष २०२६ तक भारत की गैर-जीवाश्म ऊर्जा-क्षमता लगभग २८३ गीगावाट तक पहुँच चुकी है। इसमें लगभग १५० गीगावाट सौर-ऊर्जा, ५६ गीगावाट पवन-ऊर्जा, ५१ गीगावाट बड़ी जलविद्युत, १२ गीगावाट जैव-ऊर्जा तथा लगभग ९ गीगावाट परमाणु-ऊर्जा शामिल है। भारत ने वित्तीय वर्ष २०२५-२६ में ५५.३ गीगावाट नई गैर-जीवाश्म क्षमता जोड़कर नया रिकॉर्ड स्थापित किया है।
भारत ने २०२५ में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए अपनी कुल स्थापित विद्युत क्षमता का ५०% से अधिक हिस्सा गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त कर लिया, जबकि यह लक्ष्य सन् २०३० तक पूरा किया जाना था। यह उपलब्धि भारत की हरित ऊर्जा नीति की प्रतिबद्धता और सफलता को दर्शाती है।
नवीकरणीय ऊर्जा का उज्ज्वल भविष्य
१. ऊर्जा सुरक्षा का आधार:
भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयातित तेल और गैस से पूरा करता है। नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार से विदेशी ऊर्जा-स्रोतों पर निर्भरता कम होगी और ऊर्जा आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।
२. पर्यावरण संरक्षण:
कोयला और पेट्रोलियम से उत्पन्न प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग का प्रमुख कारण है। सौर और पवन ऊर्जा, कार्बन-उत्सर्जन को कम करती हैं तथा स्वच्छ पर्यावरण के निर्माण में सहायक हैं।
३. रोजगार के नए अवसर:
सौर पैनल निर्माण, स्थापना, रखरखाव, बैटरी उत्पादन तथा हरित हाइड्रोजन उद्योग में लाखों रोजगार सृजित होने की संभावना है। भारत तेजी से एक वैश्विक ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की दिशा में तेजी से अग्रसर है।
४. हरित हाइड्रोजन का उदय:
भविष्य में हरित हाइड्रोजन उद्योग, परिवहन और इस्पात उत्पादन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है। भारत का राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
५. सौर ऊर्जा का विस्तार:
भारत ने २०२५ में १०० गीगावाट से अधिक सौर-ऊर्जा क्षमता प्राप्त कर ली। हमारे देश में एक साल में लगभग ३०० दिन अच्छी धूप होने के कारण यहाँ सौर-ऊर्जा की विशाल संभावनाएँ मौजूद हैं।
६. ग्रामीण विकास:
रूफटॉप सोलर, सोलर पंप तथा विकेन्द्रीकृत ऊर्जा प्रणालियाँ ग्रामीण क्षेत्रों को ऊर्जा उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
नवीकरणीय ऊर्जा के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ
स्थिरता की कमी:
पवन और सौर-ऊर्जा के स्रोत, अनिश्चित और अस्थिर होते हैं अर्थात् अधिकांश क्षेत्रों में पवन की गति कब और कितनी होगी? इसकी कोई गारंटी नहीं और आकाश में घने बादल होने की स्थिति में सूरज की रोशनी भी प्राप्त करना मुश्किल हो सकता है। मौसम की स्थिति में बदलाव से ऊर्जा उत्पादन में भी उतार-चढ़ाव हो सकता है जिससे मजबूत बैकअप सिस्टम की आवश्यकता होगी।
ऊर्जा भंडारण (Storage) की समस्या:
सौर-ऊर्जा केवल दिन में और पवन-ऊर्जा मौसम पर निर्भर करती है। इसलिए बिजली उत्पादन लगातार नहीं हो पाता। बड़े पैमाने पर बैटरी-भंडारण प्रणाली विकसित करना अभी भी महँगा है।
ग्रिड अवसंरचना:
उत्पादित बिजली को उपभोक्ताओं तक पहुँचाने के लिए मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क आवश्यक है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत में नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक ट्रांसमिशन अवसंरचना है।
भूमि अधिग्रहण:
विशाल सौर-पार्क और पवन परियोजनाओं के लिए बड़ी मात्रा में भूमि की आवश्यकता होती है। कई बार भूमि अधिग्रहण, सामाजिक और प्रशासनिक चुनौतियाँ उत्पन्न करता है।
वित्तीय चुनौतियाँ:
यद्यपि सौर-ऊर्जा की लागत लगातार घट रही है, फिर भी बड़ी परियोजनाओं के लिए प्रारंभिक निवेश काफी अधिक होता है। इसमें वित्तीय संस्थानों और निवेशकों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।
तकनीकी निर्भरता:
भारत ने सौर विनिर्माण में बड़ी प्रगति की है, फिर भी उच्च गुणवत्ता वाले कुछ उपकरणों और उन्नत तकनीकों के लिए आयात पर निर्भरता बनी हुई है।
बढ़ती बिजली मांग:
भारत की ऊर्जा मांग तेजी से बढ़ रही है। नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के बावजूद देश को कुछ समय तक कोयला आधारित संयंत्रों की आवश्यकता बनी रह सकती है। यही कारण है कि ऊर्जा परिवर्तन को संतुलित ढंग से आगे बढ़ाना होगा।
भविष्य की संभावनाएँ
भारत सरकार के अनुमान के अनुसार वर्ष २०३० तक ५०० गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा-क्षमता प्राप्त की जा सकती है। इससे भी आगे, सन् २०३५-३६ तक यह क्षमता लगभग ७८६ गीगावाट तक पहुँचने की संभावना व्यक्त की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में निम्न क्षेत्रों में तीव्र विकास होगा—
- रूफटॉप सोलर
- बैटरी ऊर्जा भंडारण
- इलेक्ट्रिक वाहन
- हरित हाइड्रोजन
- अपतटीय (Offshore) पवन ऊर्जा
- स्मार्ट ग्रिड प्रणाली
- सौर उपकरण निर्माण
इन क्षेत्रों में निवेश भारत को वैश्विक हरित अर्थव्यवस्था का प्रमुख केंद्र बना सकता है।
निष्कर्ष
नवीकरणीय ऊर्जा केवल एक वैकल्पिक ऊर्जा-स्रोत नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के सतत भविष्य की आधारशिला है। भारत ने २०२५-२६ तक नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं और २०३० तक ५०० गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता के लक्ष्य की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। हालांकि ऊर्जा भंडारण, ग्रिड विकास, वित्तपोषण और तकनीकी आत्मनिर्भरता जैसी चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं, फिर भी सरकार, उद्योग और समाज के संयुक्त प्रयास इन बाधाओं को दूर कर सकते हैं।
यदि वर्तमान जैसी गति आगे भी बनी रहती है, तो आने वाले दशक में भारत, विश्व के सबसे बड़े स्वच्छ-ऊर्जा उत्पादकों में से एक बन सकता है। नवीकरणीय ऊर्जा न केवल पर्यावरण संरक्षण का माध्यम बनेगी, बल्कि आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और ऊर्जा आत्मनिर्भरता की नई कहानी भी लिखेगी।
Must Read:
- नवीकरणीय ऊर्जा या अक्षय ऊर्जा
- जलवायु परिवर्तन
- पर्यावरण संरक्षण
- पर्यावरण प्रदूषण और बढ़ती स्वास्थ्य समस्याएँ
- प्रदूषण की समस्या : कारण, प्रभाव और समाधान

ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन और दिन-प्रतिदिन बढ़ते प्रदूषण के खतरे से निपटने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग आज अति-आवश्यक हो गया है।
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