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8 अक्टूबर 2026

प्रेम की भाषा मानव ही नहीं, पशु-पक्षी भी समझते हैं।

प्रस्तावना:

प्रेम, नैसर्गिक और सार्वभौमिक होता है। इसकी आवश्यकता दुनियाँ में हर जीवधारी को होती है। प्रेम किसी भाषा, जाति, धर्म या प्रजाति का मोहताज नहीं होता। यह मनुष्य के साथ-साथ पशु-पक्षियों और प्रकृति में भी सहज रूप से दिखाई देता है। माँ का अपने बच्चे के प्रति स्नेह, पक्षियों का अपने घोंसले बनाना और बच्चों की रक्षा करना तथा किसी पशु का मनुष्य के प्रेम और अपनापन को पहचानकर उसके प्रति स्नेह प्रकट करना, ये सभी बताते हैं कि प्रेम केवल शब्दों का विषय नहीं, बल्कि एक गहरी प्राकृतिक संवेदना है। 

प्रेम की भाषा मूक होती है। प्रेम को समझने और समझाने के लिए शब्दों की आवश्यकता नहीं होती। एक स्पर्श, एक दृष्टि, एक मुस्कान, एक स्नेहपूर्ण व्यवहार या किसी असहाय जीव के प्रति दिखाई गई करुणा भी प्रेम की पूरी कहानी कह सकती है। शायद यही कारण है कि प्रेम की भाषा को मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी भी भली-भाँति जानते और पहचानते हैं।

प्रेम आखिर है क्या?

प्रेम केवल किसी को पाने का नाम नहीं है, बल्कि किसी के सुख-दुःख को समझने, उसकी भावनाओं का सम्मान करने और बिना किसी स्वार्थ के उसके साथ खड़े रहने का भाव है। प्रेम में अपनापन, विश्वास, करुणा, संवेदना, त्याग और समर्पण जैसे गुण स्वाभाविक रूप से जुड़े होते हैं। सच्चा प्रेम शब्दों का मोहताज नहीं होता; वह व्यवहार और भावनाओं के माध्यम से स्वयं व्यक्त हो जाता है। 

Source: Instagram

यही कारण है कि भगवान् भी अपने भक्त के सच्चे प्रेम के वश में हो जाते हैं। प्रेम की भाषा केवल मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी भी समझते हैं। एक स्नेहभरा स्पर्श, दुलार या देखभाल उनके भीतर भी विश्वास और अपनत्व की भावना जगा देती है। सच्चा प्रेम अक्सर बोलता नहीं, बल्कि व्यवहार में दिखाई देता है।

प्रेम मनुष्य की ही नहीं, प्रकृति की भी भाषा है:

हम अक्सर सोचते हैं कि भावनाओं को व्यक्त करने की क्षमता केवल मनुष्य के पास है। निश्चित रूप से मनुष्य भावनाओं को शब्दों और विचारों के माध्यम से अधिक विस्तार से व्यक्त कर सकता है, लेकिन स्नेह और लगाव के अनेक रूप अन्य जीवों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।

पशु अपने बच्चों की देखभाल करते हैं, उन्हें खतरे से बचाते हैं और भोजन उपलब्ध कराने का प्रयास करते हैं। पक्षी भी अपने घोंसले बनाते हैं, अंडों की रक्षा करते हैं और बच्चों के लिए भोजन जुटाते हैं। इन सब व्यवहारों में हमें ममता, संरक्षण और जिम्मेदारी जैसे जो प्राकृतिक भाव दिखते हैं, वे सभी प्रेम के ही रूप हैं। 

माँ का प्रेम— "प्रेम का सबसे सहज रूप":

दुनियाँ में प्रेम का सबसे सुंदर उदाहरण माँ और बच्चे का संबंध माना जाता है। मनुष्य हो या पशु-पक्षी, अपनी संतान के प्रति ममता अत्यंत स्वाभाविक दिखाई देती है। माँ की इसी ममता को आदिशंकराचार्य ने अपनी रचना देव्यपराधक्षमापन-स्तोत्रम् में लिखा है, "कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।"

एक पक्षी अपने छोटे बच्चों के लिए दूर-दूर तक उड़कर भोजन लाती है। खतरा सामने आने पर वह स्वयं अपनी जान को जोखिम में डालकर उन्हें बचाने का प्रयास करती है। इसी तरह पशु भी अपनी संतानों के पालन-पोषण से लेकर उनकी सुरक्षा के लिए संघर्ष करते हैं।

इन दृश्यों को देखकर हमें यह समझ में आता है कि प्रेम हमेशा बड़े-बड़े शब्दों में व्यक्त नहीं होता। कभी-कभी किसी की सुरक्षा के लिए उठाया गया छोटा-सा कदम ही प्रेम की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति होता है।

पशु-पक्षी, प्रेम को कैसे पहचानते हैं?

जिन लोगों ने पशु-पक्षियों के साथ गहन समय बिताया है, वे जानते हैं कि मनुष्य के व्यवहार में अंतर हो सकता है, किन्तु पशुओं में नहीं। मनुष्य दगा दे सकता है परंतु पशु नहीं। प्यार से बुलाने पर किसी पालतू पशु का पास आना और स्नेहपूर्ण स्पर्श पर शांत हो जाना या नियमित रूप से भोजन-पानी देने वाले व्यक्ति के प्रति अपनापन दिखाना प्रेम के सहज उदाहरण हैं।

पशु, मनुष्य की तरह प्रेम की अवधारणा को भाषा में तो नहीं बांध सकते हैं, लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि अनेक जीव सुरक्षा, देखभाल, परिचित व्यवहार और स्नेहपूर्ण संपर्क के प्रति वे भी मनुष्य की भांति ही प्रतिक्रिया करते हैं। इसलिए जब हम किसी जीव के साथ करुणा और प्रेम से व्यवहार करते हैं, तो वह व्यवहार अक्सर किसी न किसी रूप में वापस हमारे सामने दिखाई देता है।

प्रेम की भाषा को शब्दों में नहीं बांधा जा सकता: 

हम मनुष्य अक्सर प्रेम को शब्दों में तलाशते हैं। हम चाहते हैं कि सामने वाला हमें बोलकर बताए कि वह हमें कितना चाहता है। लेकिन वास्तविक जीवन में प्रेम का सबसे विश्वसनीय प्रमाण शब्द नहीं, व्यवहार होता है।

Source : Facebook

किसी बुजुर्ग का हाथ पकड़ लेना, किसी दुखी व्यक्ति के दुख-दर्द सुन लेना, किसी भूखे जीव को भोजन देना, किसी बेसहारा का सहारा बनना, तपती गर्मी में पक्षियों के लिए पानी रखना या किसी घायल पशु को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाना— इनमें से किसी काम के लिए भाषण की आवश्यकता नहीं होती। प्रेम का संदेश बिना बोले भी पहुँच जाता है। यही उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है।

सच्चे प्रेम में त्याग और समर्पण:

सच्चा प्रेम केवल भावनाओं को व्यक्त करने का नाम नहीं, बल्कि उसमें त्याग और समर्पण की भावना भी निहित होती है। जब हम किसी से सच्चा प्रेम करते हैं, तो उसकी खुशी, सुख और हित को अपने स्वार्थ से ऊपर रखना सीखते हैं। माँ अपने बच्चे के लिए अनेक कष्ट सहती है, पक्षी अपने बच्चों के लिए दाना जुटाता है और पशु भी अपने बच्चों की रक्षा के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देते हैं। 

यही प्रेम का वास्तविक स्वरूप है। सच्चा प्रेम नि:स्वार्थ होता है। यह अधिकार जताने के बजाय समझने, पाने के बजाय देने और अपेक्षा करने के बजाय निःस्वार्थ समर्पण की प्रेरणा देता है, वहीं वह जीवन को अधिक मानवीय और संवेदनशील बनाता है।

छोटा-सा स्नेह, बड़ा प्रभाव:

कल्पना कीजिए कि गर्मी के किसी दिन आपकी छत या बालकनी में एक कटोरी पानी रखी है। कोई पक्षी वहाँ आता है, पानी पीता है और कुछ देर विश्राम करता है। हमारे लिए यह केवल एक छोटी-सी कटोरी है, लेकिन उस पक्षी के लिए यह उस क्षण जीवनदायी सहारा हो सकता है।

इसी तरह सड़क किनारे किसी भूखे मनुष्य या पशु को भोजन देना, किसी घायल पक्षी को बचाने का प्रयास करना या किसी छोटे जीव को अनावश्यक रूप से नुकसान न पहुँचाना, ये छोटी-छोटी बातें हमारे भीतर की संवेदनशीलता को जीवित रखती हैं। प्रेम हमेशा बड़ा काम करने का नाम नहीं है; सही समय पर किया गया छोटा-सा संवेदनशील काम भी प्रेम हो सकता है।

आज के समय में प्रेम की आवश्यकता: 

आज जीवन की गति तेज (Fast life) हो गयी है। तकनीक ने हमारी सुविधाएँ तो बढ़ा दी हैं, लेकिन कई बार हमारी संवेदनशीलता पीछे छूटती दिखाई देती है। आज जब मनुष्य अनेक प्रकार की प्रतिस्पर्धाओं, तनाव और स्वार्थ से घिरा हुआ है, तब प्रेम और करुणा की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। 

हम मोबाइल स्क्रीन पर बहुत सारे भावनात्मक संदेश देखते और एक दूसरे को भेजते भी हैं, लेकिन हमारे आसपास मौजूद किसी जरूरतमंद व्यक्ति या जीव की ओर ध्यान नहीं दे पाते। हम सोशल मीडिया पर करुणा की बातें रोज साझा करते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में किसी घायल पशु-पक्षी या असहाय व्यक्ति को देखकर मुंह फेर लेते हैं। 

यह विरोधाभास हमें सोचने के लिए मजबूर करता है। प्रेम को केवल शब्दों और सोशलमीडिया-पोस्टों में नहीं, बल्कि अपने दैनिक व्यवहार में उतारना आवश्यक है।

प्रेम बाँटने से कम नहीं होता:

धन को बाँटने से वह कम हो सकता है, लेकिन प्रेम को बाँटने से वह अक्सर और बढ़ता है। किसी को मुस्कान देना, किसी का दुःख-दर्द सुनना, किसी भूखे को भोजन देना या किसी जरूरतमंद की सहायता करना, इन सब कार्यों में हमारा कुछ न कुछ अवश्य लगता है, लेकिन बदले में मन को जो संतोष और शांति मिलती है, वह अमूल्य होता है। 

प्रेम की यही विशेषता है कि यह देने वाले और पाने वाले, दोनों को निहाल कर देता है। शायद इसलिए प्रेम को मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक माना जा सकता है।

प्रेम पर महान कवियों एवं संतों के कथन:

१) पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।- महान संत कबीरदास जी

२) "प्रेम न मुख खोलै कभऊँ, नैन देत हैं रोय॥"- संत रैदास

३) "रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय।"

"रहिमन प्रीति सराहिए, मिले होत रँग दून।"- महाकवि रहीम

४) "हेरी मैं तो प्रेम दीवानी, मेरो दरद न जाने कोय।"- मीराबाई

५) जहाँ पाने की लालसा न हो और सर्वस्व न्योछावर करने की भावना हो, वही सच्चा प्रेम है- जयशंकर प्रसाद

निष्कर्ष:

प्रेम प्रकृति की वह अनमोल भाषा है, जिसे बोलने के लिए शब्दों की नहीं, संवेदनशील हृदय की आवश्यकता होती है। मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी भी स्नेह, अपनापन और करुणा को भलीभाँति जानते और पहचानते हैं। शायद इसलिए प्रसिद्ध कवि सैम्युएल टेलर कॉलरिज (Samuel Taylor Coleridge) ने लिखा है, "ईश्वर से प्रेम का अर्थ है कि ईश्वर की बनायी हुई चीजों से प्रेम करना।"

Source: Pinterest

इसलिए प्रेम को केवल मनुष्यों तक सीमित न रखकर समस्त जीव-जगत के प्रति अपने व्यवहार में उतारना चाहिए। जहाँ प्रेम है, वहाँ दूरी और भाषा की सीमाएँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

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