15 अक्टूबर 2026

सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय : जीवन में सार्थक चीजों को अपनाने की कला

भूमिका:

आज हमारा जीवन बहुत तरह की सूचनाओं, विचारों, विकल्पों और आकर्षणों से भरा हुआ है। सुबह उठते ही मोबाइल पर संदेश, सोशल मीडिया, समाचार, वीडियो और तरह-तरह की जानकारियाँ हमारा ध्यान भटकाने लगती हैं। दिनभर हम बहुत कुछ देखते, सुनते और पढ़ते हैं, लेकिन सवाल यह है कि इन सबमें से वास्तव में हमारे जीवन के लिए उपयोगी क्या है?

कबीरदास जी ने इसी विवेकपूर्ण दृष्टि को एक अत्यंत सरल दोहे में समझाया है— “सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।” अर्थात् बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो कहीं से भी सार  (उपयोगी तत्व) को ग्रहण कर लेता है तथा व्यर्थ और निरर्थक तत्वों को छोड़ देता है।

यह दोहा केवल ज्ञान प्राप्त करने की बात नहीं करता, बल्कि जीवन जीने की एक महत्वपूर्ण कला सिखाता है— "हमें जीवन में क्या संचित करना है और क्या छोड़ देना है।"

दोहे का सरल अर्थ:

“सार” का अर्थ है— महत्वपूर्ण, उपयोगी तथा जीवन को बेहतर बनाने वाले तत्व और “थोथा” का अर्थ है— निरर्थक या अनुपयोगी तत्व।

Source: Facebook 

कबीरदास जी का संदेश है कि जैसे किसान अनाज (सार) और भूसे (थोथा) को अलग करता है, वैसे ही मनुष्य को भी जीवन में सार (उपयोगी) और थोथे (व्यर्थ) के बीच के अंतर को समझकर उसे अलग करने की कला सीखना चाहिए। 

सच्ची समझ यह है कि किसी भी चीज़ को हम पहले जांचें-परखें, उसके उपर सोच-विचार करें उसके बाद ही स्वीकार करें।

१. जीवन में हर चीज जरूरी नहीं होती:

हम अक्सर अपने जीवन में जरूरत से ज्यादा चीजें, जैसे— सामान, चिंताएँ, इच्छाएँ और महत्वाकांक्षाएँ आदि, जमा कर लेते हैं। हम यह मानते हैं कि हमारे पास जितना अधिक होगा, उतना ही हमारा जीवन सुखी और समृद्ध होगा। लेकिन वास्तविकता अक्सर इसके विपरीत होती है। जैसे बहुत अधिक सामान, घर में जगह (Space) कम कर देता है, वैसे ही बहुत अधिक सोच-विचार, मन की शांति को कम कर देते हैं, बहुत अधिक इच्छाएँ, संतोष कम कर देती हैं और बहुत अधिक जानकारियों एवं सूचनाओं का जाल, हमारे निर्णयों को उलझा देते हैं।

इसलिए समय-समय पर स्वयं से पूछना चाहिए— “क्या यह वास्तव में मेरे जीवन के लिए आवश्यक है?” यदि उत्तर नहीं में मिलता है,  तो उसे छोड़ने का साहस भी होना चाहिए।

२. जानकारी और ज्ञान में अंतर समझिए: आज इंटरनेट ने किसी भी प्रकार की जानकारी को प्राप्त करना बहुत आसान बना दिया है। कुछ सेकंड में हम किसी भी विषय पर हजारों जानकारियाँ पा सकते हैं। लेकिन जानकारी का होना और ज्ञानवान होना, दोनों समान नहीं है। जानकारी हमें बताती है कि "क्या हो रहा है?" जबकि ज्ञान हमें समझाता है कि उसका "जीवन में क्या महत्व है?"

उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति स्वास्थ्य से संबंधित अधिक जानकारी तो रखता है लेकिन स्वास्थ्य-रक्षा से संबंधित किसी भी नियम का पालन नहीं करता, जैसे कि वह संतुलित भोजन तथा पर्याप्त नींद नहीं लेता और नियमित व्यायाम भी नहीं करता है। तो उसकी जानकारी किस काम की? 

इसलिए तमाम जानकारी इकट्ठी करने के बजाय हमें उसका सार ग्रहण करके उसे जीवन में उतारना, महत्वपूर्ण है।

३. सोशल मीडिया के दौर में दोहा की यह पंक्ति और भी महत्वपूर्ण है: सोशल मीडिया ने दुनियाँ को हमारी मुट्ठी में ला दिया है लेकिन इसके साथ एक बड़ी समस्या यह है कि इससे हमारा ध्यान लगातार बंटता रहता है। एक वीडियो से दूसरे वीडियो पर जाना, बिना उद्देश्य के पोस्ट देखना, दूसरों के जीवन से अपनी तुलना करना और अनावश्यक बहसों में उलझना, धीरे-धीरे हमारे समय और मानसिक ऊर्जा को समाप्त कर सकता है।

यहाँ कबीरदास जी का संदेश बहुत स्पष्ट है कि, "हर दिखाई देने वाली चीज, देखने के योग्य नहीं होती और हर सुनाई देने वाली बात भी सुनने और ग्रहण करने के योग्य नहीं होती।" इसलिए आप सोशल मीडिया का उपयोग स्व-विवेक के साथ कीजिए। जो ग्रहण करने के योग्य है, उसे ग्रहण करें और जो आपको प्रेरणा देता है, उसे अपनाएँ। 

“सार-सार को गहि रहै” का सही अर्थ यही है कि जो तत्व आपके समय को नष्ट और और मन को व्यथित करता है, उसे छोड़ दें।  

४. रिश्तों में भी सार को पहचानना जरूरी है: रिश्तों की अहमियत समझते हुए हमें छोटी-मोटी कमियों को जहाँ नजरअंदाज करना चाहिए वहीं उनके अच्छे पक्ष को महत्व भी  देना चाहिए। कभी-कभी हम किसी व्यक्ति की दस अच्छी बातों को भूलकर उसकी एक गलती को पकड़ लेते हैं। इससे संबंध कमजोर होते हैं।

“सार-सार को गहि रहै” हमें यहाँ सिखाता है कि व्यक्ति की अच्छाई को पहचानें और छोटी कमियों को आवश्यकता से अधिक महत्व न दें।

५. आलोचना में भी सार खोजिए: जब कोई हमारी आलोचना करता है तो हमें अक्सर बुरा लगता है। लेकिन हर आलोचना को दुश्मनी समझ लेना भी उचित नहीं है। कभी-कभी आलोचना के भीतर हमारे सुधार का अवसर छिपा होता है। यदि कोई हमारी कमी बताता है, तो तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय हमें शांत होकर सोचना चाहिए— “क्या इसमें मेरे लिए कुछ सीखने योग्य है?” यदि बात सही है, तो उसे स्वीकार करें। यदि गलत है, तो उसे छोड़ दें। यही विवेक हमें भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से बचाता है।

६. असफलता में भी सार छिपा होता है: असफलता किसी को भी नहीं सुहाती। लेकिन अगर सीखने की ललक हो तो हर असफलता भी हमें कुछ न कुछ सिखाती है जैसे— हमसे कहाँ गलती हुईं? हमारा कौन-सा निर्णय गलत था? हमारी तैयारी में कहाँ कमी थी? और असफलता से बचने के लिए अगली बार क्या बेहतर किया जा सकता है? यदि हम इन प्रश्नों के उत्तर इमानदारी से खोज लेते हैं, तो असफलता भी हमारे लिए शिक्षक बन जाती है। 

इसलिए असफलता में निराश होकर बैठ जाना, थोथा है और उससे सीख लेकर आगे बढ़ना ही उसका सार है। 

८. हर बहस में जीतना जरूरी नहीं: आज छोटी-छोटी बातों पर बहस और विवाद बढ़ जाते हैं। चाहे घर-परिवार हो, समाज हो या सोशलमीडिया हो, हर जगह लोग अपनी बात को सही साबित करने में लगे रहते हैं। लेकिन क्या हर बहस जीतना वास्तव में जरूरी है? कई बार किसी विवाद से दूर रहना ही बुद्धिमानी होती है। यदि सामने वाला केवल बहस करना चाहता है और आपकी बात को समझना ही नहीं चाहता, तो आप उसे हर्गिज नहीं समझा सकते। इसलिए ऐसी जगहों पर अपनी ऊर्जा खर्च करने के बजाय मौन रहना अधिक उपयोगी हो सकता है। 

८. इच्छाओं और जरूरतों में फर्क समझिए: आधुनिक जीवन ने हमारी इच्छाओं को बहुत बढ़ा दिया है, इसे एक छोटे उदाहरण से यहाँ समझते हैं- जब हम कोई जरूरी सामान खरीदने बड़े शापिंग-माॅल में जाते हैं जहाँ हर जरूरत की चीजें एक ही जगह  मौजूद होती हैं तो वहाँ मौजूद सभी चीजों को अपने सामने देखकर, बहुत सी गैरजरूरी चीजें भी उस समय हमें जरूरी लगने लगती हैं और आनलाइन पेमेंट कर हम बहुत सारी चीजें खरीद भी लेते हैं। जिससे कभी-कभी तो पूरे महीने का बजट ही गड़बड़ा जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि “सार-सार को गहि रहै” का सिद्धांत यहाँ हमें थोड़ा रोककर सोचने के लिए कहता है— क्या सचमुच इसकी जरूरत है? 

हर इच्छा पूरी करना सफलता नहीं है, कई बार अनावश्यक इच्छाओं को छोड़ देना भी सफलता का ही पर्याय है।

९. समय के मामले में तो सबसे अधिक विवेकशील होना  चाहिए: यह तो सर्वविदित है कि धन खोने पर वापस कमाया जा सकता है, लेकिन बीता हुआ समय कभी वापस नहीं आता। इसलिए हमें अपने समय का भी “सार” पहचानना चाहिए। कुछ समय परिवार के लिए, कुछ अपने स्वास्थ्य के लिए, कुछ सीखने के लिए, कुछ समाज के लिए और कुछ समय आत्मचिंतन के लिए होना चाहिए। यदि दिन का अधिकांश समय केवल मनोरंजन, निरर्थक चर्चाओं और मोबाइल पर निकल रहा है, तो हमें अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करना चाहिए।

१०. सार, ग्रहण करने के लिए विवेक जरूरी है: “सार-सार को गहि रहै” का अर्थ यह नहीं कि हम हर चीज को अपनी पसंद के अनुसार अच्छा या बुरा घोषित करें। इसके लिए विवेक चाहिए। विवेक हमें प्रश्न पूछना सिखाता है, जैसे— क्या यह सत्य है? क्या यह उपयोगी है और क्या यह मेरे अलावा दूसरों के लिए भी हितकारी है? यदि किसी विचार या कार्य में इन तीनों का संतुलन दिखाई देता है, तो उसे अपनाने पर विचार किया जा सकता है।

दोहे के इस भाव को अपने जीवन में कैसे उतारें?

इस सीख को व्यवहार में लाने के लिए कुछ छोटे-छोटे नियम अपनाए जा सकते हैं—

  • आज हर सूचना पर तुरंत विश्वास न करें।
  • सोशल-मीडिया के उपयोग की सीमा तय करें।
  • अनावश्यक बहस से बचें।
  • आलोचना में छिपी सीख खोजें।
  • असफलता से अनुभव लें।
  • जरूरत और इच्छा में अंतर को समझकर उसकी पूर्ति करें। 
  • अच्छे रिश्ते भले ही कम हों, 
  • को महत्व दें।
  • समय को प्राथमिकता के अनुसार खर्च करें।
  • हर दिन कुछ समय आत्मचिंतन के लिए रखें।
  • जीवन में जो वास्तव में महत्वपूर्ण है, उसे कभी भीड़ में खोने न दें।

उपसंहार:

जीवन में सफलता और शांति पाने के लिए यह आवश्यक नहीं कि हम हर बात को अपनाएँ, बल्कि आवश्यक यह है कि हम सही और सार्थक बातों को पहचानकर उन्हें अपने जीवन में स्थान दें। संत कबीरदास जी का दोहा "सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय" हमें यही सीख देता है कि व्यर्थ की बातों, दिखावे और अनावश्यक उलझनों को छोड़कर ज्ञान, विवेक, अच्छे विचारों और मानवीय मूल्यों को अपनाएँ। याद रखिए, जीवन की वास्तविक समृद्धि अधिक पाने में नहीं, बल्कि सही को चुनने और सार्थक ढंग से जीने में है।

लेख से संबंधित प्रश्नोत्तर:

प्रश्न १: “सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय” का अर्थ क्या है?

उत्तर: इसका अर्थ है कि बुद्धिमान व्यक्ति किसी भी विषय में से उपयोगी और सार्थक बात को ग्रहण करता है तथा व्यर्थ एवं  निरर्थक बातों को छोड़ देता है।

प्रश्न २: इस दोहे से हमें क्या सीख मिलती है?

उत्तर: यह दोहा हमें विवेकपूर्ण जीवन जीने, उपयोगी बातों को अपनाने और अनावश्यक विचारों, विवादों तथा गतिविधियों से बचने की सीख देता है।

प्रश्न ३: आज के समय में कबीर का यह दोहा क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर: आज सूचना और विकल्पों की अधिकता के कारण सही और गलत, उपयोगी और अनुपयोगी के बीच अंतर करना कठिन हो गया है। इसलिए कबीर की यह सीख आज और भी प्रासंगिक है।

प्रश्न ४: जीवन में सार और असार की पहचान कैसे करें?

उत्तर: किसी बात को स्वीकार करने से पहले विचार करें कि वह सत्य, उपयोगी और हमारे जीवन तथा समाज के लिए हितकारी है या नहीं।

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