प्रस्तावना:-
संस्कृत साहित्य में अनेक ऐसी सूक्तियाँ और श्लोक हैं जो जीवन के गहन सत्य को अत्यंत संक्षिप्त शब्दों में उजागर करते हैं। ऐसा ही एक प्रेरणादायक वाक्य है, "तेजो यस्य विराजते, स: बलवान् स्थूलेषु क: प्रत्यय:"
अर्थात् सच्चा बल शरीर के आकार में नहीं, बल्कि चरित्र, ज्ञान, आत्मविश्वास और तेजस्विता में निहित होता है।"
यह सूक्ति हमें बताती है कि जीवन में वास्तविक शक्ति शरीर की विशालता या धन-संपत्ति से नहीं, बल्कि व्यक्ति के आंतरिक तेज, विचारों की ऊँचाई और चरित्र की दृढ़ता से उत्पन्न होती है।
आज के भौतिकवादी युग में जब लोग बाहरी दिखावे को सफलता का मापदंड मानने लगे हैं, तब यह विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो जाता है।
"तेजो यस्य विराजते, स: बलवान्" पूर्ण श्लोक
हस्ती स्थूलतनुः स चाङ्कुशवशः किं हस्तिमात्रोऽङ्कुशः
वज्रेणाभिहताः पतन्ति गिरयः किं शैलमात्रः पविः।
दीपे प्रज्वलिते विनश्यति तमः किं दीपमात्रं तमः
तेजो यस्य विराजते स बलवान् स्थूलेषु कः प्रत्ययः॥
भावार्थ: लोहे का छोटा सा अंकुश भारी और विशालकाय हाथी को भी वश में कर लेता है। छोटा किन्तु तीक्ष्ण वज्र, अपने प्रहार से विशाल पर्वत को भी खंडित कर देता है। एक छोटा दीपक घोर अंधकार को दूर कर देता है।
इस श्लोक के उपर के तीनों पंक्तियों में सवाल हैं और सबके जबाब 'नहीं' में है, जैसे-
विशालकाय हाथी और छोटा अंकुश:
विशालकाय और भारी-भरकम शरीर वाला हाथी भी छोटे से लोहे के अंकुश के वश में होता है क्योंकि अंकुश में नियंत्रण की शक्ति है। सवाल यह है, "क्या अंकुश, हाथी से भी बड़ा और ताकतवर है जो उसे नियंत्रित करता है?" इसका उत्तर 'नहीं' है।
तीक्ष्ण वज्र और विशाल पर्वत
विशाल और जड़ पर्वत भी वज्र के प्रहार से खंडित हो जाता है क्योंकि वज्र में ऊर्जा की प्रचुरता है। यहाँ सवाल ये है- "क्या वज्र, जड़ पर्वत से भी विशाल है जो उसे खंडित कर देता है?" इसका जबाब भी 'नहीं' है।
घनघोर अंधकार और छोटा दीपक
दीपक बहुत छोटा होता है जबकि अंधकार घनघोर और विस्तृत होता है किन्तु दीपक के प्रज्ज्वलित होते ही अंधकार नष्ट हो जाता है। यहाँ भी सवाल है, "क्या दीपक का विस्तार, अंधकार से भी अधिक है जिसके प्रकट होने मात्र से घनघोर अंधकार का नाश हो जाता है?" इसका भी जबाब 'नहीं' में ही है।
बल और तेजस्विता
अंतिम पंक्ति का तीक्ष्ण सवाल: बलवान कौन है? इसका जबाब: "जिसके अंदर तेज विराजमान है, वही बलवान है।"
रोचक कहानी: इस संदर्भ में बच्चों को शिक्षा हेतु पंचतंत्र में "टिट्टिभदंपति कथा" नाम की कहानी संस्कृत भाषा में आती है, जो इस प्रकार है—
बहुत समय पहले, समुद्र तट पर एक टिटहरी का जोड़ा रहता था। जब भी टिटहरी अंडे देती, समुद्र अपनी लहरों से बहा ले जाया करता था।
एक बार जब अंडे देने का समय आया तो मादा टिटहरी, नर से बोली, समुद्र हमारे अंडों को बहा ले जाता है इसलिए हमें यहाँ से कहीं दूर घोंसला बनाना चाहिए ताकि हमारे अंडे वहाँ सुरक्षित रह सकें। नर टिटहरी स्वाभिमानी और तेजस्वी था। उसने सोचा कि समस्या का हल डरकर भागना नहीं बल्कि डटकर मुकाबला करना है।
वह मादा टिटहरी से बोला कि तुम डरो मत, अबकी बार देखते हैं कि समुद्र अंडों को कैसे बहाकर ले जाता है? आखिरकार, मादा टिटहरी को जिस बात का डर था, वही हुआ। इस बार भी उसके अंडों को समुद्र बहा ले गया। यह जानकर नर टिटहरी को बहुत गुस्सा आया और मादा को सान्त्वना देते हुए बोला कि समुद्र हमारे अंडों को बहा ले गया। देखो! अब मैं इसे सुखाकर ही दम लूंगा और अपनी चोंच में समुद्र का पानी भरकर उसे दूर ले जाकर फेंकने लगा।
यह माजरा देख, टिटहरियों का दल उसे समझाने लगा कि हम सभी मिलकर भी इस विशाल सागर का कुछ नहीं बिगाड़ सकते। फिर भी वह टिटहरी अपनी जिद पर अड़ा रहा और समुद्र से अपनी चोंच में पानी भरकर दूर फेंकना जारी रखा।
यह खबर पूरी पक्षी-जाति में फैल गयी और सब मिलकर अपने राजा गरूड़ के पास गये और उन्हें सारी बात बतायी। टिटहरी के साथ हुए समुद्र के अत्याचार को जान गरुड़ को भी क्रोध आया और यह बात उन्होंने भगवान् विष्णु को बताया तब विष्णु भगवान् उन्हें समुद्र को सुखा डालने का आश्वासन दिये।
जब यह बात समुद्र को पता चली तब वह सारे अंडे लाकर मादा टिटहरी को सौंप दिया। मादा टिटहरी खुश होकर नर के पास गयी और बोली कि अब बस करो। समुद्र हमारे अंडों को वापस कर दिया। तब नर टिटहरी ने कहा, "तुमने देखा! मैंने कहा था कि इसे सुखाकर ही दम लूंगा और समुद्र डरकर हमारे अंडों को वापस कर दिया।
सीख: बलवान वो नहीं जो भारी शरीर और आकार में बड़ा हो बल्कि जिसके अंदर तेज, आत्मबल, ओज और नियंत्रण की शक्ति होती है, वास्तव में वही बलवान होता है। सच ही कहा है, "तेजो यस्य विराजते स बलवान् स्थूलेषु कः प्रत्ययः"
तेज का वास्तविक अर्थ
सामान्यतः लोग "तेज" शब्द को केवल चेहरे की चमक या आभा से जोड़ते हैं, किंतु भारतीय दर्शन में तेज का अर्थ इससे कहीं व्यापक है।
तेज का अर्थ है— ज्ञान का प्रकाश, आत्मविश्वास, सत्यनिष्ठा, नैतिक साहस, दृढ़ संकल्प, सकारात्मक ऊर्जा, आध्यात्मिक जागरूकता, नेतृत्व-क्षमता और व्यक्तित्व का प्रभाव।
जब किसी व्यक्ति में ये गुण होते हैं, तो उसके व्यक्तित्व से एक विशेष प्रकार की ऊर्जा प्रस्फुटित होती है। यही ऊर्जा दूसरों को प्रभावित करती है और उसे समाज में सम्मान दिलाती है।
केवल शरीर का बल पर्याप्त नहीं
इतिहास इस बात का साक्षी है कि केवल शारीरिक बल किसी व्यक्ति को महान नहीं बनाता। एक विशाल हाथी जंगल का सबसे बड़ा जीव हो सकता है, लेकिन शेर अपने साहस, पराक्रम और आत्मविश्वास के कारण जंगल का राजा कहलाता है।
इसी प्रकार मनुष्य के जीवन में भी केवल शरीर की शक्ति पर्याप्त नहीं होती। यदि किसी व्यक्ति के पास बल तो हो लेकिन विवेक न हो, तो वह अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर सकता है। दूसरी ओर, यदि किसी व्यक्ति के पास ज्ञान, विवेक और चरित्र है, तो वह सीमित संसाधनों के बावजूद महान कार्य कर सकता है।
इतिहास के महान व्यक्तित्व और उनका तेज
मानव-इतिहास में अनेक ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं जिनकी महानता उनके शारीरिक बल से नहीं, बल्कि उनके तेज से स्थापित हुई।
स्वामी विवेकानन्द – आत्मविश्वास और युवा चेतना का तेज
स्वामी विवेकानन्द ने विश्व को भारतीय संस्कृति, वेदांत और आध्यात्मिकता का परिचय कराया। सन् १८९३ ई. में शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में उनके ओजस्वी भाषण ने सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित किया। उनका तेज केवल वाणी में नहीं, बल्कि उनके आत्मविश्वास, राष्ट्रप्रेम और मानवता की भावना में था। उन्होंने युवाओं को संदेश दिया—"उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत।"
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस – साहस और राष्ट्रभक्ति का तेज
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का व्यक्तित्व अद्भुत साहस, आत्मविश्वास और राष्ट्रप्रेम से ओत-प्रोत था। "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा" जैसे उनके प्रेरक शब्दों ने हजारों युवाओं में स्वतंत्रता के लिए बलिदान की भावना जागृत कर दी। उनका तेज आज भी देशभक्ति का प्रेरणास्रोत है।
महात्मा गांधी – सत्य और अहिंसा का तेज
महात्मा गांधी के पास न सेना थी, न हथियार, फिर भी उन्होंने सत्य और अहिंसा के बल पर विश्व की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति को चुनौती दी। उनका नैतिक तेज इतना प्रभावशाली था कि लाखों लोग उनके पीछे चल पड़े। उनका जीवन सिद्ध करता है कि चरित्र का बल किसी भी शस्त्र से अधिक शक्तिशाली होता है।
छत्रपति शिवाजी महाराज – स्वाभिमान और नेतृत्व का तेज
छत्रपति शिवाजी महाराज ने सीमित संसाधनों के बावजूद अपने अद्भुत नेतृत्व, रणनीति और स्वाभिमान के बल पर एक शक्तिशाली साम्राज्य की स्थापना की। उनका तेज केवल युद्ध-कौशल में नहीं, बल्कि प्रजा के प्रति न्याय, महिलाओं के सम्मान और धर्मनिरपेक्ष शासन में भी दिखाई देता है।
आत्मविश्वास: तेज का सबसे महत्वपूर्ण तत्व
किसी भी व्यक्ति के तेज का प्रमुख आधार, उसका आत्मविश्वास होता है। जिस व्यक्ति को खुद पर विश्वास होता है, वह बड़ी से बड़ी कठिनाइयों का सामना कर सकता है।आत्मविश्वास व्यक्ति को यह शक्ति देता है कि वह असफलताओं से घबराए नहीं, बल्कि उनसे सीखकर आगे बढ़े।
इसलिए कहा गया है कि यदि व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास का प्रकाश है, तो वह किसी भी परिस्थिति में विजय प्राप्त कर सकता है।
ज्ञान से उत्पन्न होता है, वास्तविक तेज
ज्ञान, मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा प्रकाश-स्तंभ है। अज्ञानता व्यक्ति को भय, भ्रम और कमजोरियों की ओर ले जाती है, जबकि ज्ञान उसे साहस, विवेक और सफलता की दिशा में अग्रसर करता है।
एक शिक्षित और जागरूक व्यक्ति समाज को नई दिशा दे सकता है। इसीलिए भारतीय संस्कृति में ज्ञान को दीपक की उपमा दी गई है। ज्ञान का प्रकाश जितना बढ़ता है, व्यक्ति का तेज भी उतना ही बढ़ता जाता है।
चरित्र की शक्ति
चरित्र किसी भी व्यक्ति की सबसे बड़ी पूँजी है। धन खो जाए तो पुनः कमाया जा सकता है। स्वास्थ्य बिगड़ जाए तो उसे काफी हद तक सुधारा जा सकता है। लेकिन यदि चरित्र नष्ट हो जाए तो व्यक्ति का सम्मान ही समाप्त हो जाता है; जैसा कि अंग्रेजी में कहा है-
Wealth is lost nothing is lost, Health is lost something is lost and when Character is lost, everything is lost- Billy Graham
चरित्रवान व्यक्ति का तेज दूर-दूर तक दिखाई देता है। लोग उसके शब्दों पर विश्वास करते हैं और उसके नेतृत्व को स्वीकार करते हैं। यही कारण है कि चरित्र को वास्तविक शक्ति का आधार माना गया है।
नैतिक साहस का महत्व
जीवन में कई बार ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं जब सही मार्ग चुनना कठिन हो जाता है। ऐसे समय में नैतिक साहस ही व्यक्ति की परीक्षा लेता है। जो व्यक्ति सत्य के पक्ष में खड़ा होने का साहस रखता है, वही वास्तव में तेजस्वी कहलाता है।
सत्य बोलना, न्याय का समर्थन करना और गलत कार्यों का विरोध करना, नैतिक साहस के लक्षण हैं। ऐसे व्यक्तियों का प्रभाव समाज पर लंबे समय तक बना रहता है।
नेतृत्व और तेज:
एक सच्चा नेता केवल आदेश देने वाला व्यक्ति नहीं होता। उसके भीतर ऐसा तेज होता है, उसका ऐसा व्यक्तित्व होता है जो लोगों को उसका अनुसरण करने को प्रेरित करता है।
नेतृत्व का आधार भय नहीं, बल्कि विश्वास और सम्मान होता है। ऐसा सम्मान केवल उसी व्यक्ति को मिलता है जिसके भीतर ज्ञान, चरित्र और सेवा की भावना का तेज विद्यमान हो।
आंतरिक तेज कैसे विकसित करें?
आंतरिक तेज जन्मजात नहीं होता। इसे विकसित किया जा सकता है। इसके लिए निम्न उपाय उपयोगी होंगे—
- प्रतिदिन कुछ नया सीखने का प्रयास करें।
- नकारात्मक विचारों से दूरी बनाए रखें।
- समय का सम्मान करें।
- नियमित जीवनचर्या अपनाएँ।
- हर परिस्थिति में सत्य और ईमानदारी का साथ दें।
- प्रतिदिन अपने कार्यों और व्यवहार का मूल्यांकन करें और अपनी गलतियों को सुधारने का प्रयास करें।
- दूसरों की सहायता करने की आदत विकसित करें।
- योग, प्राणायाम और ध्यान, मानसिक स्पष्टता तथा आत्मबल बढ़ाते हैं।
- स्वस्थ शरीर ही स्वस्थ मन का आधार होता है, इसलिए स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखें।
- अच्छे लोगों का साथ व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारता है।
निष्कर्ष
"तेजो यस्य विराजते, स: बलवान् स्थूलेषु क: प्रत्यय:" केवल एक संस्कृत की सूक्ति नहीं, बल्कि जीवन का एक शाश्वत सत्य है। यह हमें सिखाती है कि वास्तविक शक्ति बाहरी रूप, शारीरिक बल या भौतिक संपदा में नहीं, बल्कि ज्ञान, आत्मविश्वास, चरित्र, नैतिक साहस और सकारात्मक व्यक्तित्व में निहित है।
जिस व्यक्ति के भीतर तेज का प्रकाश होता है, वह सीमित संसाधनों में भी महान उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकता है। अतः हमें अपने जीवन में आंतरिक तेज को विकसित करने का प्रयास करना चाहिए। यही तेज हमें सम्मान, सफलता और सार्थक जीवन की ओर ले जाता है।
👉 याद रखें: "शरीर का बल समय के साथ घट सकता है, लेकिन ज्ञान, चरित्र और आत्मबल का तेज जीवनभर आपका मार्गदर्शन करता है।"
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