4 नवंबर 2026

अधजल गगरी छलकत जाय : थोड़ी-सी सफलता पर घमंड क्यों?

भूमिका : "छोटी उपलब्धि और बड़ा अहंकार"

हमारे समाज में एक बहुत प्रसिद्ध कहावत है— “अधजल गगरी छलकत जाय।” इसका सीधा-सा अर्थ है कि आधी भरी हुई गगरी अधिक छलकती है, जबकि पूरी भरी हुई गगरी शांत और स्थिर रहती है। इस कहावत का प्रयोग उन लोगों के लिए किया जाता है, जिन्हें किसी विषय का अल्प ज्ञान या जीवन में थोड़ी-सी सफलता प्राप्त हो जाती है और वे स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगते हैं।

ऐसे लोग अपनी छोटी-सी उपलब्धि का इतना प्रदर्शन करते हैं कि उनकी वास्तविक योग्यता पीछे छूट जाती है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति वास्तव में विद्वान, अनुभवी और योग्य होता है, वह प्रायः अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटने के बजाय अपने काम से पहचाना जाना पसंद करता है।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसी भाव को रामचरितमानस में  अत्यंत सुंदर ढंग से व्यक्त किया है—

“छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई॥”

अर्थात् जैसे छोटी नदियाँ थोड़े ही पानी से अपने किनारे तोड़कर बहने लगती हैं, उसी प्रकार दुष्ट प्रवृत्ति के लोग भी थोड़ा-सा धन प्राप्त करके ही इतराने लगते हैं। यह चौपाई केवल धन के अहंकार तक सीमित नहीं है। यह ज्ञान, पद, प्रतिष्ठा, सफलता और सामाजिक सम्मान के अहंकार पर भी लागू होती है।

१. थोड़ा ज्ञान और अधिक दिखावा:

आज के समय में यह प्रवृत्ति बहुत आसानी से दिखाई देती है। किसी व्यक्ति ने कोई नई तकनीक सीख ली, कोई पुस्तक पढ़ ली या किसी विषय पर थोड़ी जानकारी प्राप्त कर ली, तो वह स्वयं को उस विषय का विशेषज्ञ समझने लगता है। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति ने इंटरनेट से स्वास्थ्य संबंधी कुछ जानकारियाँ पढ़ लीं। अब वह अपने परिवार और मित्रों को बिना उनकी परिस्थिति को ठीक से समझे दवाइयाँ लेने या उपचार की सलाह देने लगता है। और यदि कोई उसकी सलाह पर प्रश्न उठाता है, तो वह नाराज हो जाता है।

यहाँ समस्या ज्ञान प्राप्त करने में नहीं, बल्कि थोड़े ज्ञान को संपूर्ण ज्ञान मान लेने में है। ये तो सर्व विदित है कि, "अल्पज्ञान विनाशकारी होता है।" सच्चा ज्ञान व्यक्ति को विनम्र बनाता है, जबकि अधूरा ज्ञान कई बार उसे अहंकारी बना देता है।

इसलिए हमें सदैव यह समझना चाहिए कि सीखने की कोई अंतिम सीमा नहीं होती। सच तो यह है कि जितना अधिक हम सीखते हैं, उतना ही अधिक हमें अपनी अज्ञानता का एहसास होता है।

२. थोड़े-से धन पर इतराने की प्रवृत्ति:

तुलसीदास जी की चौपाई में धन के अहंकार का विशेष उल्लेख है। मान लीजिए, किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति पहले साधारण थी। उसने मेहनत की, नौकरी प्राप्त की या अपना छोटा-सा व्यवसाय शुरू किया। कुछ वर्षों में उसकी आय बढ़ गई और उसने एक अच्छा मकान तथा कार खरीद ली। यह उसकी मेहनत और सफलता का परिणाम है और उसे अपनी उपलब्धि पर प्रसन्न होने का पूरा अधिकार भी है।

लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब वह अपने संपर्की या पुराने मित्रों को छोटा समझने लगता है। वह दूसरों सम्मान उनकी आर्थिक स्थिति के आधार पर करने लगता है। किसी गरीब रिश्तेदार के घर जाने में उसे संकोच होता है और वह अपनी संपत्ति का प्रदर्शन करके दूसरों को प्रभावित करना चाहता है।

ऐसे व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि धन जीवन की सुविधाएँ बढ़ा सकता है, लेकिन वह किसी व्यक्ति की वास्तविक महानता का प्रमाण नहीं है। लोगों को यह समझना चाहिए कि समय और परिस्थिति एक जैसी नहीं रहती। आज जो व्यक्ति आर्थिक रूप से संपन्न है, कल परिस्थितियाँ बदलने पर विपन्न हो सकता है, उसे भी दूसरों के सहयोग की आवश्यकता पड़ सकती है। इसलिए धन का सदुपयोग कीजिए, लेकिन धन को अपने अहंकार का कारण मत बनने दिजिए। 

३. पद और प्रतिष्ठा का नशा:

किसी व्यक्ति को जब कोई बड़ा पद प्राप्त होता है, तो उसके व्यवहार में परिवर्तन आना स्वाभाविक नहीं, बल्कि चिंताजनक है। उदाहरण के लिए, किसी कार्यालय में एक कर्मचारी को पदोन्नति मिल जाती है। पहले वह अपने सहकर्मियों के साथ मिलकर काम करता था परंतु पदोन्नति के बाद वह उनसे ठीक से बात नहीं करता, अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को अपमानित करता है और हर समय अपनी कुर्सी का धौंस जमाता है।

वास्तव में पद किसी व्यक्ति को जिम्मेदारी देता है, दूसरों से श्रेष्ठ होने का अधिकार नहीं। एक अच्छा अधिकारी वह नहीं है, जिससे उसके अधीनस्थ कर्मचारी डरते हों। अच्छा अधिकारी वह है, जिसके नेतृत्व में कर्मचारी सम्मान और विश्वास के साथ काम कर सकें। याद रखिए, कोई भी व्यक्ति कुर्सी से ऊँचा नहीं होता बल्कि अपने सद्व्यवहार से होता है। 

४. आज की दुनियाँ का दिखावे पर अधिक जोर:

आज सोशल मीडिया ने भी इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। किसी व्यक्ति की एक तस्वीर पर हजारों लाइक आ जाएँ, तो वह स्वयं को लोकप्रिय समझने लगता है। किसी वीडियो पर अधिक व्यूज मिलने लगें, तो वह अपनी राय को अंतिम सत्य मानने लगता है। धीरे-धीरे उसके लिए वास्तविक जीवन की उपलब्धियों से अधिक महत्वपूर्ण लोगों की प्रतिक्रिया हो जाती है। वह दूसरों की सफलता देखकर प्रसन्न होने के बजाय उनसे अपनी तुलना करने लगता है। सोशल मीडिया पर लोकप्रियता मिलना अच्छी बात है, लेकिन लोकप्रियता और वास्तविक योग्यता में अंतर होता है।

किसी व्यक्ति की तस्वीर पर हजारों लोग प्रतिक्रिया दे सकते हैं, लेकिन उसके कठिन समय में साथ देने वाले लोग बहुत कम हो सकते हैं। इसलिए हमें यह समझना चाहिए कि जीवन की वास्तविक सफलता लाइक, कमेंट और फॉलोअर्स की संख्या से नहीं, बल्कि हमारे सद्व्यवहार, अच्छे कार्य और मधुर संबंधों से निर्धारित होती है।

५. सच्ची विद्वता और विनम्रता

इतिहास और समाज में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं, जहाँ महान व्यक्तियों ने अपनी योग्यता के बावजूद विनम्रता को अपने जीवन का आधार बनाया। सच्चा विद्वान अपनी बात रखने से पहले दूसरों की बात सुनता है। वह किसी प्रश्न को अपनी प्रतिष्ठा के विरुद्ध नहीं मानता। यदि कोई उससे अधिक जानता है, तो वह उससे सीखने में संकोच नहीं करता। इसके विपरीत, आधा-अधूरे ज्ञान वाला व्यक्ति कई बार अपनी बात को सही सिद्ध करने के लिए अनावश्यक तर्क-वितर्क करता रहता है।

व्यवहारिक जीवन में इसका एक सरल उदाहरण है। यदि किसी बैठक में कोई सहकर्मी आपकी गलती बता दे, तो आप दो तरह से प्रतिक्रिया दे सकते हैं। पहला, आप नाराज होकर कहें—“तुम अब मुझे सिखाओगे?” दूसरा, आप शांत होकर कहें—“आपने मेरी गलती बताई, इसके लिए धन्यवाद। मैं इसे सुधारने का प्रयास करूँगा।” पहली प्रतिक्रिया अहंकार को दर्शाती है, जबकि दूसरी प्रतिक्रिया सीखने की इच्छा और आत्मविश्वास को। विनम्रता कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मविश्वास की परिपक्व अवस्था है।

६. थोड़ी सफलता मिलने पर दूसरों को छोटा न समझें

जीवन में सफलता प्राप्त करना अच्छी बात है। लेकिन सफलता का वास्तविक मूल्य तभी है, जब वह हमारे व्यवहार को भी बेहतर बनाए। 

यदि कोई विद्यार्थी परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करता है, तो उसे उन विद्यार्थियों का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए, जिनके अंक कम आए हैं। यदि किसी व्यक्ति को नौकरी मिल जाती है, तो उसे बेरोजगार मित्रों के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए। यदि कोई व्यवसायी सफल हो जाता है, तो उसे अपने कर्मचारियों के परिश्रम का सम्मान करना चाहिए।

हमारी उपलब्धियाँ हमें दूसरों से अलग पहचान दे सकती हैं, लेकिन दूसरों को अपमानित करने का अधिकार नहीं देतीं। यह भी याद रखना चाहिए कि हर व्यक्ति की परिस्थितियाँ अलग होती हैं। किसी की सफलता जल्दी दिखाई देती है, तो किसी की सफलता में वर्षों लग जाते हैं। इसलिए किसी की वर्तमान स्थिति देखकर उसके भविष्य का निर्णय करना उचित नहीं है।

७. अहंकार से बचने के व्यावहारिक उपाय

यदि हम अपने भीतर “अधजल गगरी” जैसी प्रवृत्ति को पनपने से रोकना चाहते हैं, तो कुछ सरल उपाय अपना सकते हैं—

१. प्रतिदिन कुछ नया पढ़ें, समझें और अपने ज्ञान को बढ़ाने का प्रयास करें।

२. दूसरों की बात ध्यान से सुनें। हर व्यक्ति के पास कोई न कोई अनुभव होता है, जिससे हम सीख सकते हैं।

३. अपनी उपलब्धियों का श्रेय दूसरों को भी दें। 

४. अपनी गलतियों को सहर्ष स्वीकार करें।

५. दूसरों से तुलना करने के बजाय स्वयं को बेहतर बनाएँ।

६. अपनी सफलता को सेवा का माध्यम बनाएँ। यदि हमारे पास ज्ञान, धन या अनुभव है, तो उसका उपयोग दूसरों के जीवन को बेहतर बनाने में करें।

उपसंहार

“अधजल गगरी छलकत जाय” केवल एक कहावत नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाला महत्वपूर्ण संदेश है। थोड़ी-सी उपलब्धि पर इतराना और दूसरों को छोटा समझना व्यक्ति की वास्तविक प्रगति में बाधा बनता है। यह हमें यही सिखाती है कि धन, पद, ज्ञान और प्रतिष्ठा मिलने पर भी हमें विनम्र बने रहना चाहिए।

याद रखिए, फलदार वृक्ष सदैव झुका रहता है और गहरी नदी शांत बहती है। जीवन में इतना ज्ञान अर्जित करें कि दूसरों का सम्मान कर सकें, इतनी सफलता प्राप्त करें कि जरूरतमंदों की सहायता कर सकें और इतनी विनम्रता बनाए रखें कि अपनी उपलब्धियों के बावजूद सीखना न छोड़ें। यही वास्तविक महानता है।

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