26 जनवरी 2026

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वर: गुरु का दिव्य महत्व

भूमिका

भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में गुरु को केवल शिक्षक नहीं माना गया, बल्कि उसे जीवन को दिशा देने वाला, अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने वाला पथप्रदर्शक कहा गया है। योगशिखोपनिषद में कहा गया है कि गुरु से बड़ा कोई नहीं है। 

इसी भाव को अत्यंत सुंदर रूप में व्यक्त करता है यह प्रसिद्ध श्लोक—

“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। 

गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥”

अर्थात् गुरु सृजनकर्ता ब्रह्मा, पालनहार श्रीहरि विष्णु एवं संहारकर्ता शिव के समान हैं। गुरु ही साक्षात् परम-ब्रह्म हैं। ऐसे श्री-गुरु को नमन। 

Source: You Tube

गुरु को ब्रह्मा क्यों कहा गया है?

जिस तरह ब्रह्मा सृष्टि के सृजनहार हैं, उसी प्रकार गुरु हमारे भीतर ज्ञान, विवेक और आत्मबोध का सृजन करते हैं। एक शिष्य का जीवन, गुरु के मार्गदर्शन से नया आकार लेता है।

👉 सही सोच, सही दिशा और सही उद्देश्य—इन सबका जन्म गुरु से ही होता है।

गुरु विष्णु के समान कैसे?

जिस तरह विष्णु भगवान सृष्टि के पालनकर्ता हैं, वैसे ही गुरु भी शिष्य के ज्ञान, चरित्र और संस्कारों का पालन करते हैं। जब शिष्य का पग सन्मार्ग से भटकने लगता है, तब एकमात्र गुरु ही उसे संभालते हैं। गुरु का संरक्षण ही शिष्य की सबसे बड़ी शक्ति है।

गुरु महेश्वर (शिव) क्यों?

जैसे भगवान शिव संहार के देवता हैं—पर यह संहार नकारात्मक नहीं, बल्कि अज्ञान, अहंकार और भ्रम का नाश है।वैसे ही गुरु भी हमारे भीतर बैठे अहंकार, भय, अज्ञान, नकारात्मक सोच एवं वृत्तियों का नाश करते हैं।

गुरु और ईश्वर में क्या अंतर है?

यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है—गुरु बड़े हैं या ईश्वर? भारतीय दर्शन कहता है, "ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग गुरु ही दिखाते हैं।" जैसा कि संत कबीर दास जी ने कहा है—

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय। 

बलिहारी गुरु आपनो, गोविन्द दियो बताय।। 

अर्थात, गुरु और गोविन्द (भगवान) एक साथ खड़े हों तो किसे प्रणाम करना चाहिए, गुरु को या गोविन्द को? ऐसी स्थिति में गुरु के चरणों में शीश झुकाना चाहिए। क्योंकि गुरु के मार्गदर्शन से ही हमें भगवान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त होता है ।

ईश्वर निराकार हो सकते हैं, लेकिन गुरु साकार होते हैं— जिनसे हम प्रश्न कर सकते हैं, सीख सकते हैं और जीवन जीने की कला समझ सकते हैं।

सनातन धर्म में गुरु का स्थान

सनातन संस्कृति में कहा गया है— “आचार्य देवो भवः।” माता-पिता जन्म देते हैं, लेकिन गुरु जीवन जीना सिखाते हैं। इसीलिए गुरु का स्थान माता-पिता और ईश्वर से भी ऊँचा माना गया है।

गुरु की महिमा का वर्णन बहुत से संतों ने किया है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है —

गुरु बिनु भवनिधि तरइ न कोई। जों बिरंचि संकर सम होई।।

अर्थात गुरु के बिना कोई भी भवसागर से पार नहीं कर सकता, भले ही वो कोई ब्रह्मा, शंकर के समान ही क्यों न हो।

इसीलिए गुरु का स्थान सर्वश्रेष्ठ बताया गया है।

गुरु का आध्यात्मिक महत्व

गुरु वह प्रकाश हैं जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का मार्ग दिखाते हैं। वे केवल शिक्षा ही नहीं देते, बल्कि सही-गलत की पहचान, संस्कार, अनुशासन और जीवन जीने की कला सिखाते हैं। गुरु शिष्य के भीतर छिपी क्षमताओं को पहचान कर उन्हें निखारते हैं और आत्मविश्वास व सही दिशा प्रदान करते हैं। जीवन के कठिन मोड़ों पर गुरु का मार्गदर्शन प्रेरणा बनता है। इसीलिए भारतीय संस्कृति में गुरु को ईश्वर से भी ऊँचा स्थान दिया गया है।

Source: Gyan Ki Paathshala

गुरु बिन ज्ञान न उपजे, गुरु बिन मिटे न भेद। 

गुरु बिन संशय ना मिटे, भले वांचो चारों वेद।।

अर्थ: गुरु के बिना न तो सच्चा ज्ञान उत्पन्न नहीं होता है और न तो मोह-माया और सत्य-असत्य का भेद ही समझ में आता है। भले ही कोई चारों वेदों का ज्ञाता हो फिर भी गुरु के मार्गदर्शन के बिना मन के संदेह दूर नहीं होते हैं।

संत कबीर दास जी गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि-

सात समंद की मसि करौं, लेखनि सब बनराइ।

धरती सब कागद करौं, गुरु गुन लिखा न जाइ॥

अर्थ: यदि मैं सातों समुद्रों के जल की स्याही बना लूँ, सभी जंगलों की कलम बना लूँ, तथा समूची पृथ्वी को काग़ज़ बना लूँ, तब भी गुरु के गुणों को लिखा नहीं जा सकता। क्योंकि गुरु के गुण अनंत हैं।

सच्चे गुरु की पहचान

आज के समय में यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण एवं प्रासंगिक भी है। सच्चा गुरु वो है, जो—

  • शिष्य को अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाए। 
  • अहंकार नहीं, विवेक सिखाए। 
  • अंधविश्वास नहीं, आत्मबोध दे।
  • केवल उपदेश ही नहीं बल्कि अपने आचरण से भी मार्गदर्शन करे। 
  • शिष्य के भीतर आत्मविश्वास, विवेक और आत्मबोध जगाये।    
  • शिष्य को अपने ऊपर निर्भर नहीं, आत्मनिर्भर बनाए। 

आधुनिक जीवन में गुरु की भूमिका

आधुनिक युग में गुरु केवल आश्रम या गुरुकुल तक सीमित नहीं हैं— शिक्षक, मार्गदर्शक, कोच, मेंटर, प्रेरक, लेखक, ये सभी किसी न किसी रूप में गुरु की ही तो भूमिका निभाते हैं। वे छात्रों को तकनीकी ज्ञान के साथ-साथ नैतिक मूल्य, विवेक और आत्मविश्वास भी प्रदान करते हैं। तेजी से बदलती दुनियाँ में गुरु विद्यार्थियों को सही-गलत में भेद करना, जीवन की चुनौतियों से जूझना और जिम्मेदार नागरिक बनना सिखाते हैं। इस प्रकार गुरु आज भी व्यक्तित्व निर्माण और समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

गुरुर्ब्रह्मा....श्लोक से जीवन की सीख

इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि—

  • ज्ञान से बड़ा कोई धन नहीं। 
  • गुरु के बिना जीवन अधूरा है। 
  • सच्चा गुरु जीवन बदल सकता है। 

जो व्यक्ति गुरु का सम्मान करता है, जीवन स्वयं उसका सम्मान करता है।

निष्कर्ष

“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वर:” केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन दर्शन है। यह हमें सिखाता है कि, "गुरु के चरणों में ही ज्ञान है, दिशा है और मोक्ष का मार्ग है।"

🙏 ऐसे सभी गुरुओं को कोटि-कोटि नमन।

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