23 जुलाई 2025

"वसुधैव कुटुम्बकम्"- विश्व बंधुत्व का आधार

प्रस्तावना:

“वसुधैव कुटुम्बकम्"- संस्कृत का एक ऐसा श्लोकांश है जिसमें भारत की प्राचीन और गहरी सोच समाई हुई है। इसका हिन्दी में शाब्दिक अर्थ है, “यह पूरी पृथ्वी ही एक परिवार है।” और अंग्रेजी में- "The Whole World is a Family"। यह वाक्य सिर्फ एक विचार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा है, जो विश्व में प्रेम, भाईचारा और शांति की भावना का संदेश देता है।

आज जब दुनियाँ जाति, धर्म, रंग और भाषा के आधार पर बंटती जा रही है, तब यह विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यह केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक मार्गदर्शक सिद्धांत है जो मानवता को जोड़ने का प्रयास करता है।


यह ब्लॉग विश्व बंधुत्व, भारतीय संस्कृति और वर्तमान वैश्विक समस्याओं के समाधान में इस विचार के उपयोग पर आधारित है। इसमें "वसुधैव कुटुम्बकम्" का अर्थ, महत्व और इसकी व्यवहारिक व्याख्या की गयी है। 

१. "वसुधैव कुटुम्बकम्" की उत्पत्ति और अर्थ:

यह विचार महाउपनिषद नामक ग्रंथ से लिया गया है। पूरा श्लोक इस प्रकार है- "अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥"

अर्थ: “यह मेरा है, वह पराया है, यह सोच संकीर्ण मानसिकता वालों की होती है। उदार हृदय वाले तो पूरे विश्व को ही एक परिवार मानते हैं।”

यह उपनिषद का विचार भारत की उस सभ्यता को दर्शाता है जहाँ आत्मा की व्यापकता को केवल शरीर तक नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि तक फैला बताया गया है।

२. भारतीय संस्कृति में वसुधैव कुटुम्बकम् का स्थान:

भारत की संस्कृति सहिष्णुता, विविधता और सबको साथ लेकर चलने में विश्वास करती है। चाहे अतिथि देवो भव: की भावना हो या सर्वे भवन्तु सुखिनः का मंत्र, सबमें एक ही उद्देश्य छिपा है — सबका कल्याण, सबका सम्मान।

  • भारत ने सदा से अपने द्वार दुनियाँ भर के विचारों के लिए खुले रखे।
  • यहाँ विभिन्न धर्म, पंथ और सभ्यताएं पनपीं और फलीं-फूलीं।
  • सर्व धर्म समभाव’ का सिद्धांत, इसी भावना का व्यावहारिक रूप है।

३. विश्व बंधुत्व का विचार; समय की मांग:

आज जब दुनियाँ भर में युद्ध, संघर्ष, शरणार्थी समस्या, सांस्कृतिक टकराव और सामाजिक असहिष्णुता बढ़ रही है, तब "वसुधैव कुटुम्बकम्" एक समाधान बनकर सामने आता है।

वर्तमान समस्याएं:

  • धार्मिक असहिष्णुता
  • नस्लीय भेदभाव
  • शरणार्थी संकट
  • वैश्विक असमानताएँ
  • जलवायु परिवर्तन और साझा ज़िम्मेदारी की कमी

समाधान का मार्ग:

  • यदि हर राष्ट्र, धर्म और व्यक्ति यह माने कि समूची पृथ्वी ही एक परिवार है, तो सहयोग और समरसता बढ़ेगी।
  • आज सीमाओं से परे होकर सोचने की आवश्यकता है, जहाँ मानवमात्र का कल्याण पहला धर्म हो।

४. "वसुधैव कुटुम्बकम्" का व्यवहारिक जीवन में प्रयोग: 

यह विचार सिर्फ पुस्तकों तक सीमित नहीं है, इसे अपने दैनिक जीवन में अपनाकर हम बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं।

व्यक्तिगत स्तर पर: 

  • सभी के प्रति समान व्यवहार रखें, चाहे वे किसी जाति, धर्म या वर्ग के हों।
  • अपने बच्चों को सिखाएं कि सब मनुष्य एक समान हैं। ऊंच-नींच, अमीर-गरीब का भेदभाव न रखें। 
  • पड़ोसियों, कर्मचारियों और सहकर्मियों को उचित सम्मान दें।

सामाजिक स्तर पर: 

  • समाज में एकता, सह-अस्तित्व और विविधता का सम्मान करें।
  • सांप्रदायिक एकता के कार्यक्रमों में भाग लें।
  • हर वर्ग और क्षेत्र के लोगों को बराबरी का अवसर देने में विश्वास रखें।

राष्ट्रीय / वैश्विक स्तर पर: 

  • राष्ट्रों को अपने-अपने हितों से ऊपर उठकर वैश्विक कल्याण की दिशा में काम करना चाहिए।
  • संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक संगठनों को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का विचार अपने दृष्टिकोण में शामिल करना चाहिए।
  • जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक संकट पर मिलकर काम करना चाहिए।

५. महापुरुषों के विचार और प्रेरणाएं:

“मेरे लिए कोई भी विदेशी नहीं है, हम सभी एक ही परमात्मा की संतान हैं।"- महात्मा गॉंधी

“समस्त मानवजाति एक है। हम सबका उद्देश्य एक है, आत्मोन्नति।”- स्वामी विवेकानंद

६. वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत का योगदान:

 अ) अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस: भारत ने योग के माध्यम से पूरी दुनियाँ को शांति और स्वास्थ्य का मार्ग दिखाया। यह "वसुधैव कुटुम्बकम्" का व्यावहारिक उदाहरण है।

ब) कोविड-19 संकट के दौरान भारत की वैक्सीन  नीति: भारत ने दर्जनों देशों को मुफ्त में वैक्सीन देकर विश्व बंधुत्व की अनूठी मिसाल कायम की।

स) भारत की “ग्लोबल साउथ” नीति: भारत उन देशों के साथ भी खड़ा है जो संसाधनों की कमी के कारण वैश्विक निर्णयों से वंचित रह जाते हैं। यह नीति, वैश्विक समावेशिता की ओर एक बड़ा कदम है।

७. तकनीकी युग में वसुधैव कुटुम्बकम्:

आज हम डिजिटल युग में हैं जहाँ सीमाएं भौगोलिक नहीं, मानसिक होती हैं। सोशल मीडिया, इंटरनेट और वैश्विक संवाद ने एक प्रकार से "वसुधैव कुटुम्बकम्" को संभव बना दिया है। उदाहरण-

  • कोई भारतीय छात्र जापान में ऑनलाइन पढ़ सकता है।
  • अफ्रीका में बैठा किसान भारतीय ऐप्स से खेती की जानकारी ले सकता है।
  • अमेज़न या फ्लिपकार्ट जैसे प्लेटफ़ॉर्म पर एक ही वस्तु को दुनियाँ भर के लोग खरीद सकते हैं।

यह हमें दिखाता है कि दुनियाँ आज पहले से कहीं ज़्यादा जुड़ी हुई है, बस जरूरत है अपने दृष्टिकोण में ‘एकता’ की भावना लाने की। 

८. वसुधैव कुटुम्बकम् और जलवायु परिवर्तन:

पृथ्वी की रक्षा करना अब केवल किसी एक देश या समाज की ज़िम्मेदारी नहीं रही, पूरी मानवता को मिलकर इस धरा रूपी परिवार की देखभाल करनी होगी।

  • वनों की कटाई रोकना। 
  • प्लास्टिक का प्रयोग कम करना। 
  • कार्बन-उत्सर्जन को कम करने के उपाय करना। 
  • जल संरक्षण। 
  • नवीकरणीय ऊर्जा का प्रयोग। 

यदि हम वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना से सोचें, तो हम अपने संसाधनों को इस भाव से उपयोग करेंगे कि वे आने वाली पीढ़ियों और दूसरे देशों के लिए भी सुरक्षित रहें।

९. "वसुधैव कुटुम्बकम्" विचारधारा में युवाओं की भूमिका:

वर्तमान पीढ़ी को इस विचारधारा को केवल पढ़ने की नहीं, बल्कि जीने की आवश्यकता है।

  • डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग वैश्विक संवाद के लिए करें।
  • विविधताओं को स्वीकारें और उनका सम्मान करें।
  • सिर्फ स्थानीय सोच तक सीमित न रहें।
  • जाति, धर्म और वर्ग से परे होकर सामुदायिक सेवा करें।

निष्कर्ष: 

“वसुधैव कुटुम्बकम्" कोई कल्पना नहीं, बल्कि एक जीवनशैली है। यह हमें सिखाता है कि हम सभी एक ही परिवार का हिस्सा हैं, जहाँ सहयोग, सहिष्णुता और प्रेम के बिना जीवन असंभव है। यदि हम इस विचार को व्यवहार में उतार लें तो शांति संभव है, विकास टिकाऊ होगा और विश्व में नई ऊर्जा आएगी।

आज की सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि हम सीमाओं से परे सोचें और मानवता को सर्वोपरि रखें। तभी हम वास्तव में  “वसुधैव कुटुम्बकम्सं" अर्थात् संपूर्ण विश्व ही हमारा परिवार है का मंत्र चरितार्थ कर पायेंगे। 

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