प्रस्तावना
मनुष्य का जीवन सुख-दुःख, लाभ-हानि, सफलता-असफलता, मिलन-विछोह और आशा-निराशा आदि अनेक प्रकार के रंगों से भरा हुआ है। जब जीवन में सब कुछ हमारी इच्छा के अनुसार चलता है, तब हमें ईश्वर की व्यवस्था पर पूर्ण विश्वास रहता है। लेकिन जब परिस्थितियाँ विपरीत हो जाती हैं, योजनाएँ विफल हो जाती हैं या किसी प्रिय वस्तु अथवा व्यक्ति को खोना पड़ता है, तब मन में अनेक प्रश्न उठने लगते हैं। हम सोचते हैं कि आखिर हमारे साथ ही ऐसा क्यों हुआ?
ऐसे समय में एक विचार हमें संभाल सकता है और वह है, "ईश्वर का कोई भी विधान गलत नहीं होता।" यह केवल धार्मिक वाक्य नहीं है, बल्कि जीवन को समझने का एक गहरा और व्यवहारिक दृष्टिकोण है। इसका अर्थ यह नहीं कि जीवन में दुःख नहीं आएंगे, बल्कि इसका अर्थ यह है कि जो कुछ भी घटित हो रहा है, उसके पीछे कोई न कोई उद्देश्य, जीवन के लिए सबक या कल्याण अवश्य छिपा होता है।
हम सभी की इच्छायें, कामनाएँ अपने-अपने तरीके की, अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार होती हैं। जबकि ईश्वर का विधान पूरे ब्रहमाण्ड के लिए होता है, समस्त जीवजंतु, पशुपक्षी, वनस्पति, चर-अचर सबके कल्याण के लिए होता है।
ईश्वर का विधान क्या है?
विधान का अर्थ है— कानून, न्याय-व्यवस्था या योजना। जिस प्रकार प्रकृति निश्चित नियमों पर चलती है, उसी प्रकार सम्पूर्ण सृष्टि भी एक महान व्यवस्था के अंतर्गत संचालित होती है।
सूर्य प्रतिदिन उगता है और अस्त होता है, ऋतुएँ बदलती हैं, छोटे बीज से बड़ा वृक्ष बनता है, जन्म के बाद मृत्यु आती है—ये सभी ईश्वरीय विधान के उदाहरण हैं। मनुष्य चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न बन जाए, वह इन नियमों को बदल नहीं सकता।
ईश्वर का विधान केवल प्रकृति तक ही सीमित नहीं है, बल्कि हमारे जीवन की समस्त घटनाओं में भी कार्य करता है। कई बार जो घटना हमें घटित होने के समय बुरी लगती है, वही भविष्य में हमारे लिए वरदान सिद्ध होती है।
हम ईश्वर के विधान को गलत क्यों समझते हैं?
अक्सर हम किसी घटना को केवल वर्तमान दृष्टि से देखते हैं। हमारी सोच सीमित होती है, जबकि ईश्वर की योजना व्यापक होती है।
मान लीजिए कि किसी व्यक्ति की नौकरी चली गई। उस समय उसे लगता है कि उसके साथ अन्याय हुआ है। वह दुखी हो जाता है। लेकिन कुछ महीनों बाद उसे उससे बेहतर अवसर मिल जाता है। तब उसे समझ आता है कि जो हुआ, वह अंततः उसके हित में था।
समस्या यह है कि हम कहानी का केवल एक पृष्ठ पढ़ते हैं, जबकि ईश्वर पूरी पुस्तक देख रहा होता है।
हर घटना हमें कुछ सिखाती है
जीवन में आने वाली हर परिस्थिति एक शिक्षक की तरह होती है। सफलता हमें आत्मविश्वास देती है और असफलता हमें अनुभव देती है।
यदि कभी हमें असफलता न मिले, तो हम अपनी कमियों को कैसे पहचानेंगे? यदि संघर्ष न हो, तो हमारी क्षमता कैसे विकसित होगी, उसमें सरसता कैसे आयेगी?
ईश्वर का विधान कई बार हमें कठिन रास्तों से इसलिए गुजारता है ताकि हम मानसिक रूप से मजबूत बन सकें। जिस प्रकार सोना आग में तपकर कुंदन बनता है, उसी प्रकार मनुष्य भी कठिनाइयों से गुजरकर निखरता है।
धैर्य का महत्व
ईश्वर की व्यवस्था को समझने के लिए धैर्य आवश्यक है। कई बार जीवन में ऐसी घटनाएँ घटित होती हैं जिनका कारण तुरंत समझ में नहीं आता। इस विषय में एक बड़ी दिलचस्प कहानी है —
एक समय की बात है, भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर कैलाश पर्वत पर गये। उन्होंने गरुड़ को बाहर रुकने को कहकर स्वयं महादेव जी से मिलने एक गुफा में प्रवेश कर गये। बाहर गरुड़ जी कैलाश के मनमोहक सौन्दर्य को निहारने लगे। तभी क्या देखते हैं कि उनसे कुछ ही दूरी पर एक बहुत ही सुंदर नन्हीं चिड़िया बैठी है। उसी समय यमराज भी वहाँ आये और उस चिड़िया को देख मुस्कुराते हुए वो भी उसी गुफा में प्रवेश कर गये जिसमें कुछ ही देर पहले विष्णु भगवान गये थे।
इधर पक्षीराज गरुड़ ने सोचा कि यमराज उस पक्षी को देखकर मुस्कुराये, इसका अर्थ तो ये हुआ कि वे जरूर उस पक्षी का प्राण हरने आये हैं। अतएव उसे बचाने हेतु गरुड़ उस सुंदर पक्षी को कैलाश से उठाकर सैकड़ों मील दूर एक सुरक्षित स्थान पर रख आये।
जब थोड़ी देर में यमराज गुफा से बाहर निकले तो गरुड़ ने उनसे पूछा कि आप उस सुंदर चिड़िया को देखकर क्यों मुस्कुराये? यमराज ने जबाब दिया कि चिड़िया की मौत इस कैलाश पर्वत पर नहीं हो सकती थी। उसकी मौत तो यहाँ से दूर सांप के द्वारा लिखी हुई थी।
यह सुनकर गरुड़ को बड़ा ही आश्चर्य हुआ और सोचे कि कैसे मैं उस चिड़िया को बचाने के चक्कर में खुद ही उसकी मृत्यु का कारण बन गया। इसलिए सच ही कहा है, "ईश्वर का कोई भी विधान गलत नहीं होता।"
एक किसान बीज बोने के बाद रोज उसे खोदकर नहीं देखता कि पौधा निकला या नहीं। वह धैर्य रखता है और तभी समय आने पर फसल प्राप्त करता है। ठीक इसी प्रकार जीवन में भी कई परिणाम समय आने पर स्पष्ट होते हैं। जो बात आज समझ नहीं आती, वह कुछ वर्षों बाद बिल्कुल स्पष्ट दिखाई देने लगती है।
सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करें
जब हम किसी कठिन परिस्थिति का सामना करते हैं, तब हमारे सामने दो विकल्प होते हैं— पहला परिस्थितियों को कोसना और दूसरा उनसे सीख लेकर आगे बढ़ना।
ईश्वर के विधान पर विश्वास रखने वाला व्यक्ति दूसरी राह चुनता है। वह हर परिस्थिति में अवसर खोजने का प्रयास करता है।
यदि कोई व्यक्ति व्यवसाय में नुकसान झेलता है, तो वह उससे मिले अनुभव का उपयोग भविष्य में बेहतर निर्णय लेने के लिए कर सकता है। यदि कोई परिक्षार्थी, परीक्षा में असफल होता है, तो वह अपनी तैयारी को आगे और बेहतर बना सकता है।
इस प्रकार कठिनाइयाँ भी सफलता की सीढ़ी बन सकती हैं।
कर्म और ईश्वर का विधान
ईश्वर का विधान यह नहीं कहता कि मनुष्य कर्म करना ही छोड़ दे। वास्तव में कर्म करना ही जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
ईश्वर ने हमें बुद्धि, क्षमता और अवसर दिए हैं। उनका उपयोग करना हमारा कर्तव्य है। परिणाम हमारे हाथ में नहीं होते, लेकिन प्रयास अवश्य हमारे हाथ में होते हैं।
यदि कोई छात्र पढ़ाई किए बिना केवल ईश्वर से अच्छे परिणाम की प्रार्थना करे, तो यह उचित नहीं होगा। ईश्वर का विधान कर्म और परिणाम के सिद्धांत पर आधारित है।
अतः हमें पूरी निष्ठा से अपने कर्म करना चाहिए और परिणाम को स्वीकार करने की शक्ति भी विकसित करनी चाहिए।
जीवन की कठिनाइयाँ भी वरदान हो सकती हैं
इतिहास और वर्तमान जीवन में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ प्रारंभिक कठिनाइयाँ बाद में महान उपलब्धियों का कारण बनीं।
कई सफल व्यक्तियों ने गरीबी, असफलता, उपहास और संघर्ष का सामना किया। यदि वे उन कठिन परिस्थितियों में हार मान लेते, तो शायद वे कभी सफल न हो पाते।
कई बार जीवन हमें उस दिशा में धकेल देता है जहाँ जाने की हमने कल्पना भी नहीं की होती। बाद में वही दिशा हमारे लिए सबसे उपयुक्त सिद्ध होती है। इसलिए किसी भी परिस्थिति को अंतिम सत्य मान लेना उचित नहीं है।
विश्वास क्यों आवश्यक है?
विश्वास मनुष्य को मानसिक शक्ति प्रदान करता है। जब व्यक्ति को यह भरोसा होता है कि ईश्वर की योजना में उसका कल्याण निहित है, तब वह कठिन परिस्थितियों में भी टूटता नहीं है।
विश्वास का अर्थ अंधविश्वास नहीं है। इसका अर्थ है—सकारात्मक सोच, धैर्य, कर्मशीलता और आशावाद।
विश्वास रखने वाला व्यक्ति चुनौतियों से भागता नहीं, बल्कि उनका डटकर सामना करता है। उसे यह भरोसा होता है कि हर रात के बाद सुबह अवश्य आती है।
प्रकृति हमें क्या सिखाती है?
प्रकृति का प्रत्येक दृश्य हमें ईश्वर के विधान की याद दिलाता है।
- अंधेरी रात के बाद सूर्योदय होता है।
- पतझड़ के बाद ही बसंत आता है।
- सूखी धरती पर वर्षा होती है।
- छोटा सा बीज, विशाल वृक्ष बन जाता है।
यदि प्रकृति में परिवर्तन और संतुलन का यह नियम सत्य है, तो जीवन में भी दुःख स्थायी नहीं हो सकता। कठिन समय भी एक दिन समाप्त होता है।
ईश्वर का हर विधान सर्व-मंगलकारी होता है (एक प्रेरणादायक प्रसंग)
एक व्यक्ति की दो लड़कियाँ थीं। जब दोनों लड़कियाँ सयानी होकर विवाह के योग्य हुयीं तो बड़ी लड़की का विवाह उसने माली के घर किया जबकि छोटी का कुम्हार के घर्।
बहुत दिनों के उपरांत वह अपनी लड़कियों का कुशल-क्षेम जानने हेतु पहले बड़ी लड़की के घर गया जो माली से ब्याही थी और उससे उसका समाचार पूछा। उस लड़की ने कहा पिताजी! और सब तो ठीक है लेकिन बड़ी तकलीफ यह है कि अच्छी बारिश नहीं हो रही है। अधिक धूप होने से फूल मुरझा जाते हैं। उसका समाचार जानकर वह वापस अपने घर लौट आया।
दो-चार दिन आराम कर, वह अपनी कुम्हार के घर वाली छोटी लड़की के यहाँ गया और उसका भी समाचार पूछा। उसने बड़ी ही मायूसी से बोली, "पिताजी! सबसे तकलीफ की बात यह है तेज धूप नहीं हो रही है। बारिश हो जाने से मिट्टी के बर्तन सूख नहीं रहे हैं।
अब वह आदमी तो अपना माथा पकड़ लिया। आखिर वह किसकी सुने और किसकी नहीं सुने? किसके साथ न्याय करे? एक लड़की को धूप नहीं बारिश चाहिए जबकि दूसरी को बारिश नहीं धूप चाहिए।
जरा सोचिए! हम-आप खुद को ही नहीं सम्हाल पा रहे हैं, खुद से ही परेशान हैं। ईश्वर को तो समस्त सृष्टि को देखना है। सबके साथ न्याय करना है। सभी जीव-जन्तुओं के बीच संतुलन स्थापित कर, सबका कल्याण करना है। इसीलिए ईश्वर का विधान सर्व-मंगलकारी होता है, इसमें शंका नहीं करना चाहिए।
शिकायत नहीं, स्वीकार्यता सीखें
स्वीकार्यता का अर्थ हार मान लेना नहीं है। इसका अर्थ है वास्तविकता को समझना और उसके अनुसार आगे बढ़ना।
जब हम बार-बार शिकायत करते हैं, तब हमारी सृजनात्मक ऊर्जा, नकारात्मक विचारों में नष्ट हो जाती है। लेकिन जब हम परिस्थिति को स्वीकार करके समाधान खोजते हैं, तब हम आगे बढ़ने लगते हैं।
ईश्वर का विधान स्वीकार करने वाला व्यक्ति परिस्थितियों का दास नहीं बनता, बल्कि उनका सामना करने वाला योद्धा बन जाता है।
जीवन में ईश्वर के विधान को कैसे समझें?
१. नियमित आत्मचिंतन करें: अपने जीवन की पुरानी घटनाओं को याद करें। आपको पता चलेगा कि कई घटनाएँ जो उस समय बुरी लगी थीं, बाद में लाभदायक सिद्ध हुईं।
२. धैर्य रखें: हर प्रश्न का उत्तर तुरंत नहीं मिलता। समय को अपना कार्य करने दें।
३. सकारात्मक लोगों के साथ रहें: अच्छा वातावरण विश्वास और आशा को मजबूत बनाता है।
४. कर्म करते रहें: कर्म ही जीवन की प्रगति का आधार है। परिणाम की चिंता से अधिक प्रयास पर ध्यान दें।
५. कृतज्ञता का अभ्यास करें: जो कुछ आपके पास है, उसके लिए आभार व्यक्त करें। इससे जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदलता है।
निष्कर्ष
"ईश्वर का कोई भी विधान गलत नहीं होता" केवल एक धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक सकारात्मक कला है। इसका अर्थ है कि हम अपने कर्म करते हुए धैर्य, विश्वास और सकारात्मक सोच बनाए रखें।
जीवन में आने वाली हर परिस्थिति किसी न किसी उद्देश्य से आती है। कुछ घटनाएँ हमें सफलता देती हैं और कुछ हमें सीख देती हैं। दोनों ही हमारे विकास के लिए आवश्यक हैं।
जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि ईश्वर की व्यवस्था व्यापक और कल्याणकारी है, तब हमारे मन में शिकायत की जगह शांति, भय की जगह विश्वास और निराशा की जगह आशा जन्म लेती है।
अतः जीवन में चाहे कैसी भी परिस्थिति आए, यह याद रखें कि ईश्वर का कोई भी विधान गलत नहीं होता। हो सकता है कि आज जो समझ में नहीं आ रहा, वही कल आपके जीवन की सबसे बड़ी सीख या सबसे बड़ा वरदान बन जाए।
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